Květen 2027 — první oficiální evropská cesta Mahámandaléšvary Karauli Shankar Mahadev Maharaje.Návštěva GurudévaRegistrovat zájem
Raw transcript · Hindi

Gurudévovy promluvy

Unedited transcription from the original online meeting.

OTHER SPEAKER:

अब आप अनम्यूट हैं। जब आपको कहा जाएगा, तभी आप कर पाएंगे। गुरुदेव का स्क्रीन, यस। अनिरुद्ध, गुरुदेव के स्क्रीन को अनम्यूट कर देना। हाँ, ठीक है।

तो जैसा बता रहे थे, यह हमारा परम सौभाग्य है कि हम गुरुदेव के शिष्य हैं, हम सभी। और यह गुरुदेव की असीम कृपा है कि हमेशा चाहे एक करोड़ शिष्य हों, गुरुदेव की दृष्टि हर व्यक्ति पर है। यह मैंने पिछले एक महीने में, मेरे अनुभव में आया।

जब गुरुदेव चिंतित हो गए कि यहाँ नकारात्मकता वह शक्ति फैला रही है, वहाँ नकारात्मकता वह प्राचीन शक्ति फैला रही है, वह शक्ति जिसकी पूजा संपूर्ण विश्व कर रहा होता है। और गुरुदेव उसके लिए विशेष अनुष्ठान किए, और आप सबसे, कईयों से हमारी बात हुई अलग-अलग माध्यम से। गुरुदेव ने यहाँ अनुष्ठान पूरा किया और पूरे पृथ्वी पर आप जहाँ पर भी हैं, आप उन रोग और कष्ट, जो तकलीफें, जो नकारात्मकता आपके अंदर जन्म ले रही थीं, उससे तुरंत व्यक्ति मुक्ति मिल पाई। यह हमारे गुरुदेव ही हैं जो ऐसा कर सकते हैं।

हाँ, बोलो।

जहाँ पे ये गुरुदेव का अनुरोध गुरुदेव का अनम्यूट करो। गुरुदेव म्यूट हो गए हैं। जैसे ही ये हो, गुरुदेव को अनम्यूट करो। गुरुदेव म्यूट हो गए हैं। हाँ, गुरुदेव का म्यूट हो गया है, अनम्यूट करें। अनम्यूट करो गुरुदेव को।

OTHER SPEAKER:

हाँ राजीव भैया, हरी ओम।

GURUDEV:

हरिओम गुरुदेव। आवाज़ आ रही राजीव भैया?

OTHER SPEAKER:

जी गुरुदेव, जी गुरुदेव।

GURUDEV:

चलिए पुनः सभी का अभिनंदन, स्वागत इस सभा में सबका स्वागत पुनः से।

अच्छी आप लोगों की शुरुआत है कि ऐसा सोचा गया है कि हम सभी वहाँ में कम से कम दो बार जो मीटिंग के द्वारा जुड़ पाएं और तमाम जो दिक्कतियाँ हैं, जिन्हें सही माने रहते हैं, उसे समय पर जो एकाकार हो जाता है उनसे छुटकारा पा सकें। ये आवश्यक है।

इस मीटिंग का उद्देश्य भी यही है कि हम सभी रोगी नकारात्मक स्मृतियों से मुक्ति पा सकें क्योंकि कहना बहुत सरल है। मुक्ति शब्द सुनना भी अच्छा लगता है, सबको चाहिए, लेकिन वाकई में ये जो मुक्ति है, सरल व्यक्ति के लिए बहुत सरल है और जटिल व्यक्ति के लिए बहुत जटिल।

इस सूत्र है। जितना आदमी सरल होता जाता है, उतना ही वो इन बंधनों से मुक्त होता जाता है। जितना जटिल होता जाता है, उतना ही वो बंधन में वो कसता है।

हम केवल अपनी बनाई हुई स्मृतियों से ही परेशान नहीं हैं। स्मृतियों को जिस लेवल पर हम देखते हैं, वो काफ़ी खतरनाक है। एक स्मृति आपका जीवन संवार सकती है, मोक्ष के दे सकती है। पर एक स्मृति वो भी है जो आपको मोक्ष के दरवाजे से आपको वापस मिला सकती है, नरक में डाल सकती है।

सतर्क रहना है और सजग रहना है।

दो ही रास्ते हैं मुक्ति से भटकाने के, तीसरा रास्ता बनेगा भी नहीं, न था, न है, न आगे बनेगा। एक रास्ता है भय का और दूसरा रास्ता है लालच का।

लालच किसी प्रकार का हो सकता है, केवल धन का ही नहीं, मुक्ति का भी लालच हो सकता है। ये जो भय और लालच, इनको अगर आपने ठीक से देखना सीख लिया और ये भी समझ गए कि ये जो भय और लालच है, ये हमें कहाँ लेके जाए, कहाँ गिराएगा, किस गड्ढे में गिराएगा, तो निश्चित रूप से आपका पथ दोनों सुगम हो जाएंगे और सरल।

क्योंकि इन शक्तियों का, क्योंकि शक्ति पर शक्ति है मेरी नजर में। न नकारात्मक है न सकारात्मक। हम जैसा होते हैं शक्ति वैसा बन जाता है।

अगर हम नकारात्मक हैं तो जो शक्ति हमको मिलेगी वो हमको नकारात्मकता ही बढ़ाएगी, हमारी नेगेटिविटी को बढ़ाएगी। और अगर हम सकारात्मक हैं तो जो भी एनर्जी मिलेगी हमारी सकारात्मकता वो बढ़ाएगी, पॉज़िटिविटी को बढ़ाएगी।

यही नियम है। व्यवस्था है।

भोग काटने की व्यवस्था है। लेकिन उस भोग काटने में आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है, दुर्गति हो जाती है, वह दुर्गति भी ना हो। उससे दरबार बचाने के लिए कोशिश करता है कि आपके भोग ऐसे ही कट जाएँ सहजता से, साधना से, ताकि आपको कष्ट भी न महसूस हो और आप इनसे पार भी हो।

तो जो व्यवस्था है, वो बनी बनाई है। और जो बनी बनाई व्यवस्था है, जो एसेंशियल है, उसका बदला लिया जा सकता है। जो सेमी-एसेंशियल है, नॉन-एसेंशियल है, उसको बदला भी लिया सकता है। नया सृजन भी किया जा सकता है।

एसेंशियल का मतलब हम समझ सकते हैं जैसे सूरज, सूर्य, अपने समय पर उदय होना और अपने समय पर अस्त होना, ये एसेंशियल पार्ट है। दिन होना, रात होना, ये एसेंशियल पार्ट है। हवा का पूरे वायुमंडल में, पूरे सृष्टि में बहते रहना उसका स्वभाव है।

धरती के नीचे तेल होना, कोयला होना, ये धरती का अपना आभूषण है। धरती पर वृक्षों का होना, जंगलों का होना, समुद्र का होना, पहाड़ों का होना, ये धरती का आभूषण है, ये व्यवस्था है।

अगर इस व्यवस्था को न छेड़ा जाए तो जीना सरल है सभी का। प्राणवस्था की प्राथमिकताओं से लेकर के मनुष्य तक, सबका जीना बहुत सरल है।

लेकिन जब मनुष्य जाति इन सब को छेड़ती है, तो इस स्थूल रूप से जीने में जो कष्ट आते हैं, वो तो आते ही हैं, सूक्ष्म जगत डिस्टर्ब होता है, असंतुलित हो जाता है।

फिर उसको संतुलित करने के लिए व्यवस्था आगे आती है, व्यवस्था फिर में जो आगे बढ़ता है, उसका क्या हाल होता है, किसी का पता होता है।

लेकिन व्यवस्था व्यवस्था बनाके छोड़ती है। उसको किसी के मरने से, किसी के उजड़ने से नुकसान होने से, उससे लेना ही देना नहीं, वो तो व्यवस्था है। व्यवस्था को उसको संतुलित करना है।

इसलिए हमने संतुलित किया है।

हमने जंगल काट के पहाड़ काट के धरती को खोद के खनिज निकाल के तेल कोयला निकाल के ज़मीन के अंदर से, जो ताप को सोखते हैं वृक्ष हमारे ताप को सोखते हैं वायुमंडल के, अच्छी ऑक्सीजन देते हैं।

कोयला और तेल ज़मीन के अंदर है, वो तापमान को सोखता है। डेजर्ट वगैरह आप देखिए कितना नीचे तेल है, दिन में तपिश और रात में ठंडा हो जाती है। सारा तापमान सोख लेता है तेल और कोयला।

यही उसका स्वभाव है, इसलिए कोयला जलाने पे बहुत तेज़ जलता है, तेल जलाने पे बहुत तेज़ जलता है क्योंकि ऊर्जा संक्षिप्त हो रही है और वो कर्मों वर्षों से आता है। वो ऊर्जा है।

वहीं रहने के लिए बनाया गया है कोयला जहाँ है, तेल वहीं रहने के लिए बनाया गया जहाँ पर अभी वह है।

हमने उसको अपने उपयोग का साधन मान लिया, हम पृथ्वी हमारे लिए बनी हुई, दुनिया हमारे लिए बनी हुई, ऐसा मान बैठे तो जीना कठिन हो गया।

हँसते जा रहे हैं। एक से निकलते हैं. दूसरे में फँस जाते हैं, दलदल जैसा हो गया। एक पैर निकालने की कोशिश में दूसरा पैर और गहरे चला जाता है।

सारा तेल, सारा कोयला सब निकाल के जलाया जा रहा है।

सृष्टि के उद्भव में जब इसका निर्माण हुआ तो ये नहीं समझा गया होगा कि कोई धरती से कोयला और तेल निकाल करके बाहर जलाएगा। इसलिए ऐसी वनस्पतियाँ नहीं बनीं बाहर धरती पर, कि उनसे पैदा होने वाली जो गैसें, गैसों से उनको सोख सके, फिल्टिंग कर सके उसकी और परिवर्तित कर सके।

जैसे कार्बन डाइऑक्साइड को पता है कि हम लोग छोड़ते हैं, वृक्षों का निर्माण हुआ है, वो लेकर के बदलें, ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

तो व्यवस्था बनी हुई है।

व्यवस्था में ये रही था कि हम नीचे से कोयला निकाल के जला भी देंगे उसको। तो वायुमंडल में क्या हुआ? भयाना का संतुलन पैदा हुआ और हुआ संतुलन भी वैज्ञानिकों ने चिल्लाना शुरू किया कि ग्लोबल वॉर्मिंग, एक नाम दिया ग्लोबल वॉर्मिंग।

बहुत सुंदर नाम था, उसका नाम रखा ग्लोबल वॉर्मिंग।

फिर बोले वो ओजोन की परत हट रही है, ओजोन की परत हटती जा रही है और अल्ट्रा वायलेट जो किरणें हैं, वो नीचे आ रही हैं धरती पर, और ग्लेशियर्स को पिघला रही हैं और तापमान बढ़ा रही हैं धीरे-धीरे वायुमंडल में।

हर साल पूरे विश्व के लोग इकट्ठे होते हैं ग्लोबल वॉर्मिंग के नाम पे मीटिंग, मीटिंग और चीटिंग करके अगले साल का लेते हैं और फिर समस्या जहाँ की वहाँ।

तो सृष्टि के दोहन की जो व्यवस्था है, वो सृष्टि का दोहन है। मनुष्य ने अपनी मौत का सामान इकट्ठा किया है और अपनी मौत का सामान फैलता रहता है हमसे।

ये जो सृष्टि है, हम भी उसका एक पार्ट। मनुष्य भूल जाता है, हम भी उसी सृष्टि का पार्ट हैं।

जिस सृष्टि का पार्ट कोयला है, तेल है, पहाड़ है, जंगल है, सब अणु हैं, पदार्थ हैं, प्राणवस्था की गायियाँ हैं, सारी जीव-जंतु हैं, सारे पशु-पक्षी, उसी तरह हम भी सृष्टि का एक पार्ट।

अस्तित्व के रूप में हम प्रतिष्ठित हैं इस संसार, लेकिन हमने मान लिया है कि सब वस्तुएँ हमारे भोगने के लिए हैं, इनका हम भोग करेंगे, सृष्टि हमारे लिए है, अपने को सृष्टि से बाहर मान लिया, संकट यहाँ से पैदा हुआ।

और जितने बड़े-बड़े विचारक रहे, जितने बड़े-बड़े वैज्ञानिक रहे, अंत में उन्होंने अपने आविष्कार के लिए केवल पश्चाताप किया है, काश हमने ये आविष्कार न किया होता, इससे सृष्टि का विनाश हो रहा है।

लेकिन कर चुके। लोग पुस्तक लिख जाते हैं कि हमने गलत व्याख्या दी है संसार, लेकिन अब आदमी को गलत व्याख्या वाली पुस्तक पढ़ने की फुर्सत ही नहीं, या बहुत लोगों को पता ही नहीं। सबने लिखा है, इतने बड़े-बड़े वैज्ञानिकों ने।

केवल लाखों लिखा है अगर लिखने का मौका नहीं मिला है कि हम तो कई जगह जानते, सही नहीं थे। बड़ी ईमानदारी से उन्होंने काम किया है।

तो इसलिए हमें सबसे ज़्यादा ध्यान जो हमारा होना चाहिए, वो सूक्ष्म जगत पर होना चाहिए।

इस स्थूल जगत पर तो ध्यान दूसरे पर है। लेकिन दरबार ने आपको सिखाया है कि सूक्ष्म जगत में आप दूसरों पर भी ध्यान रख सकते हैं और अपने पर भी ध्यान रख सकते हैं और उन चीज़ों से बाहर निकल के आ सकते हैं जिनके दर्द में पूरी मानव जाति फँसी हुई है।

आपका दरबार ऐसा है कि आपको इस तमाम नकारात्मकता से पीछे हटाता है और ऐसा छूट नहीं होता है, आपकी प्रार्थना संकल्प से होता है, आपकी आस्था विश्वास और सुविधा से होता है।

हम जब भी किसी चीज़ के, किसी वस्तु के पीछे भागते हैं हमेशा ध्यान रखो कोई वस्तु आपसे और आगे तेज दौड़ लगाती है।

आप जितनी बार उसके पीछे भागते हैं, जिस वस्तु से आपकी मोह, अहंकार नष्ट हो जाता है, कोई वस्तु आपको पीछे-पीछे चलती रहती है।

यही नियम है, यही नियम।

OTHER SPEAKER:

एक ट्रांसलेशन के लिए गुरुदेव थोड़ा सा...

GURUDEV:

वो प्रगाति एसेंशियल वस्तुएँ हैं। एक सूक्ष्म जगत में हैं और दूसरी इस स्थूल जगत में।

अगर सूरज और चंद्रमा उनका उदय होने का, अस्त होने का समय मनुष्य बदल सकता है, तो इसको भी बदलने की कोशिश करता है। सौभाग्य है सृष्टि का कि वो उसके हाथ में नहीं है।

धरती में भी तमाम ऐसी एसेंशियल सिचुएशंस, जिनको बदला नहीं जाना चाहिए, लेकिन ये मनुष्य उसको बदलने का प्रयास करता है।

जैसे मैंने बताया, धरती के नीचे से जो वस्तुएँ हैं निकाल के बाहर लाना, उसका दुरुपयोग कर...

जल है, बहता हुआ जल, पीने का अधिकार मनुष्य जाति को।

हम लोगों ने धरती में कितने छेद किए हैं, गिन नहीं सकते। धरती का सीना फाड़ा है। तेल, कोयला निकाला है बाहर धरती से, सीना फाड़ के।

तमाम जंगल, पहाड़ हम काटते ही रहते हैं। तमाम अननेचुरल चीज़ से हम तमाम गैसेस उनका दोहन करते रहते हैं, फिर उनको अग्नि देते हैं, जलाते हैं।

तो इस स्थूल में तो उसका दुष्प्रभाव पड़ता ही है जो हम कर रहे हैं।

लेकिन शायद आपको नहीं पता होगा, जो दुष्कर्म मनुष्य जाति इस स्थूल जगत में कर रही है उसका सूक्ष्म में परिवर्तित हो जाता है।

और सृष्टि आपके इस स्थूल को बैलेंस नहीं करती, सृष्टि उस सूक्ष्म को बैलेंस करती है।

उस सूक्ष्म को जब दुबारा बैलेंस करती है वो, तो इस स्थूल जगत की हालत खराब हो जाती है।

कहते हैं बाढ़ आ रही है, तो कोई कहेगा भूकंप आ रहा है, कोई ज्वालामुखी फट रहा है, पहाड़ गिर रहे हैं, धरती फट रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं।

आज ग्लेशियर क्यों पिघल रहे हैं?

जो धरती का तापमान है, जो बढ़ रहा है धरती पर, उसके कारण उन ग्लेशियर्स को ग्लेशियर्स बने रहने में समस्या आ रही है।

तो ग्लेशियर पिघल रहे हैं उस अनवांटेड तापमान के कारण, टेम्परेचर के कारण। ग्लेशियर धीरे-धीरे पिघल रहे हैं।

और एक नहीं, लाखों जगह पर पूरी दुनिया में बड़े-बड़े भंडार बन गए हैं ग्लेशियर्स पिघल-पिघल के।

जिस दिन ये फटेंगे, जिस दिन ये झीलें फटेंगी एक साथ, आदमी के सामने सबसे बड़ा संकट होगा जल प्रलय।

कुछ नहीं बचता।

एक छोटा सा उदाहरण हमारे पड़ोसी देश में, छोटा सा देश है, प्यारा सा देश, नेचुरल रिसोर्सेस से भरा हुआ, थोड़ा सा भ्रमित।

छोटे से ग्लेशियर्स पिघले, झील बनी, और पिघले, झील तो बाँध टूटे और इतना बड़ा सैलाब आया कि शायद इस मनुष्य जाति ने ही सदी में इतना बड़ा सैलाब इतनी गति के साथ शायद आज तक नहीं देखा।

इतनी तेज़ तो पहाड़ों को ऊपर से नीचे गिरने वाले झरने भी बहते, इतनी स्पीड में वो जल बहकर के उसने हजारों जिंदगियाँ तबाह कर दीं, हजारों लोगों को बेघर कर दिया, पाँच मिनट के अंदर, केवल पाँच मिनट।

सोच लो अगर ये ऐसा पाँच घंटे चले, ये तो ट्रेलर था छोटा सा सृष्टि का। पाँच घंटे चले अगर लगातार, ये दस घंटे चले, ऐसा क्या बचेगा, कितना बचेगा, क्या-क्या बचा होगा?

फिर वो वस्तुएँ महत्वपूर्ण हो जाएँगी जो वस्तुएँ अभी आपको बेकार-सी लगती हैं।

अरे इससे क्या होगा, ये तो बाजार में पैसा फेंकेंगे और यूँ ले लेंगे।

अपने को खाना चाहिए, ये पैसा फेंका और ये आ गया चावल। ये पैसा फेंका सब्जी आ गई। ये पैसा फेंका, जो वस्तुएँ हमारे मतलब की हैं आ गईं।

जब धरती नहीं बचेगी, धरती बीमार हो जाएगी, जल प्रलय हो जाएगी, जल ही जल चारों ओर होगा, कहीं आग होगी तो कहीं जल होगा।

क्या खाओगे?

सोना-चाँदी खा नहीं सकते, जिसके लिए आप पहाड़ खोद रहे हैं, जिसके लिए आप जंगल काट रहे हैं, जिसके लिए आप तेल खोद के नीचे से निकाल रहे हैं धरती से, कोयला निकाल के बाहर ला रहे हैं, जला दे रहे हैं उसको, बदले में सोना-चाँदी बना रहे हैं, बैंक बैलेंस बना रहे हैं।

एक किलो गेहूँ मांगने के लिए हो सकता है आपको लाखों रुपए देना पड़े, करोड़ों रुपए देना पड़े किसी को ये एक बोरा गेहूँ देने।

पूरी संपत्ति देनी पड़े हो सकता है।

क्योंकि तब वो वाली चीज़ महत्वपूर्ण हो जाएगी, वास्तव में है। जो वास्तव में है ही, वो चीजें सब महत्वपूर्ण हो जाएँगी।

जैसे कोरोना काल, वो तमाम चीजें महत्वपूर्ण हो गईं, जिनको हमने तिलांजलि दे रखी।

वो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गईं। सारी वस्तुएँ महत्वपूर्ण हो गईं, सारी नदियाँ, पहाड़, जंगल सब शुद्ध पवित्र हो गए।

आपके शांत होते ही सब शांति हो गई।

जंगल शांत, पहाड़ शांत, सब शांत हो जाओ।

तो मुझे खाँसी आती है।

अरे भाई, ये सब पहले से ही शांत है। तुम शांत हो जाओ।

मनुष्य जाति शांत हो जाए केवल। ये पहले से शांत है।

ये मनुष्य जाति की अशांति से चारों ओर अशांति दिख रही है।

कोरोना काल में केवल मनुष्य जाति शांत हो गई, कि कमरे से बाहर नहीं निकली।

पहले से सब कुछ शांत था।

आपको दर्शन हो गए कि कौन शांत था और किसकी अशांति के कारण पूरी सृष्टि में अशांति थी।

वाह, बहुत बढ़िया कहते हैं।

सब कुछ पहले से शांत है, आनंद में है, व्यवस्था में है।

अगर अव्यवस्था कोई फैलाता है, तो मनुष्य जाति से ज़्यादा अव्यवस्था फैलाने वाला संसार में कोई प्राणी नहीं है।

शेर शिकार कर लेता है, दिन में दो कर लेता है। आदमी को करने हो तो दो-चार-पाँच सौ शिकार करेगा पहले, बाद में।

चिड़िया कितना आएगी, खेत से कितना चुगेगी, थोड़ा-सा चुग लिए, पच्चीस-पचास दाने पेट भर गया।

हाथी कितना खाएगा रोज़? इतने पेड़ गिराएगा? एक पेड़ गिरा ले, दो गिरा ले।

आदमी को मौका लगता है तो हज़ारों पेड़ एक दिन में गिरा देता है, लाखों पेड़ गिरा देता है।

और इसको शक्ति दी है ईश्वर ने, इस मनुष्य शरीर को कि लाखों पेड़ वो लगा भी सकता है।

तो सारा फोकस बने हुए सिस्टम को बिगाड़ने का है।

जो एसेंशियल पार्ट धरती में है, कोयला है, तेल है, अन्न है, वायु है, जल है, जिसको प्रदूषित कर रहा है, खनन करने।

ये एसेंशियल पार्ट सृष्टि का, जिसको हम प्रदूषित कर रहे हैं।

और ध्यान रखो, जब ये प्रदूषित होगा इस स्थूल में, तो सूक्ष्म भी उसका प्रदूषित हो जाता है।

और जैसे ही सूक्ष्म को खबर लगती है प्रदूषित हुआ, एक मिनट से बाहर गए, वो फिर से वापस दूसरी व्यवस्था में लाने की कोशिश करता है, जैसे वो था, जैसा होना चाहिए।

उसमें पूरी मानव जाति को पूरी सृष्टि की आवाज़ निकल जाती है।

बड़ा बवंडर खड़ा हो जाता है, हाहाकार मच जाता है, त्राही त्राही, त्राही त्राही लोग चिल्लाने लगते हैं, बचाओ, बचाओ!

चारों ओर से चीखें गूंजती हैं, पूरे-पूरे परिवार नष्ट हो जाते हैं, पूरे-पूरे समाज फिर तो इकट्ठे नष्ट हो जाते हैं, हज़ारों लोग, पूरे-पूरे गाँव उजड़ जाते हैं।

सभ्यता में पीछे देखा जाए तो पूरे-पूरे शहर उजड़ गए, पूरी-पूरी सभ्यता समाप्त हो गई।

इसी प्रकार समाप्त होंगी धरती को बीमार करके, धरती का दोहन करके, प्रकृति का दोहन करके, ये सब नष्ट होंगे।

आज मनुष्य समाज उसी ओर तेजी से बढ़ रहा है।

आज हमें ध्यान देना होगा।

दो पाठ दरबार कहता है, ध्यान देना है और ध्यान करना है।

ध्यान देने वाला पाठ ही उतना ही महत्वपूर्ण है जितना महत्वपूर्ण ध्यान करना है।

इसलिए दोनों को नहीं भूलना है।

अपने आसपास के वातावरणों को, प्रकृति को, प्राकृतिक रूप से ही रहने देना है, वैसे ही बहने देना है, जैसे वो बनी है, जैसे वो बहती है।

उसमें जीना सीखना है।

हमारा जीना इतना होता है, जैसे भ्रम, सुबह-शाम क्या दो रोटी खानी, दाल-लोकी, सब्ज़ी थोड़ी।

लेकिन मारामारी इतनी है कि एक दिन में इतना पैदा कर लें, इकट्ठा कर लें कि पूरा ज़िंदगी बैठकर खाएँ।

ऐसा हर आदमी करता है।

और ये दौड़ कभी खत्म नहीं होती।

इस दौड़ को दौड़ से अलग होकर के देखेंगे तो इस दौड़ के विकार समझ में आएंगे, इस दौड़ से कैसे बचा जाए, ये समझ में आएगा और दूसरों को कैसे बचाया जाए, ये भी समझ में आ जाएगा।

लेकिन इसके लिए उस दौड़ से बाहर निकलना ज़रूरी है।

दौड़ में मुड़ाई करके आप दौड़ का अंदाजा नहीं लगा सकते।

आप गाड़ी के अंदर बैठकर के गाड़ी की स्पीड नहीं पता कर सकते, ट्रेन की।

ट्रेन के बाहर खड़े होंगे, स्टेशन पर, तो आपको स्पीड दिखती है कि ये गई, इतनी स्पीड थी।

इस दौड़ से बाहर निकलना है और सबसे पहले स्वयं को निकालना है।

आपको निकलता देख करके लोगों में perception बनेगा, ये लोगों में धारणा बनेगी।

आज वो आएँ लोगों।

आपका अनुसरण करेंगे लोग, आपका अनुकरण करेंगे और वो भी इससे अपनी मुक्ति निकलने की कोशिश करेंगे।

जब आप निकलेंगे तो सब निकलेंगे बाहर।

इसके लिए प्रयास स्वयं को करना है और इसीलिए एक व्यवस्था है कि हम ध्यान में जाकर करके चीजों को ठीक कर दें।

जैसे हमने कई बार आप लोगों को दिखाया है, आपसे जो रोपे हुए हैं, उनमें से बहुत से लोगों को मैंने special session, खासतौर से जो चेक कर रहे, जिससे बैठे हुए लोग, कुछ लोग अमेरिका से जुड़े हुए, दूसरे देशों से जुड़े हुए लोग, जो लोग बैठे हैं हम लोगों के साथ, मेरे साथ personal, मैंने उनके शरीर के अंदर की यात्रा कराई थी।

अपने शरीर के अंदर देख सकें, खोज सकें कि मुझमें इस स्थूल रूप से मेरे शरीर में क्या गड़बड़ है।

ये भी देख सकें, देख सकें और उसको ठीक भी कर सकें अपने प्रार्थना संकल्प से।

जो देखा वो आपकी स्मृति बन गई, उसका प्रार्थना संकल्प कर लीजिए, नष्ट हो जाएगी।

जो देखा नहीं है तो उसकी स्मृति नहीं आपके अंदर।

तो बहुत चीजें वो नष्ट नहीं होतीं, बनी रहती हैं।

जब आप स्वयं देख पाते हैं अपने शरीर के अंदर कि मेरे शरीर में क्या विकृति है, मेरे शरीर में कौन-कौन से रोग हैं, कहाँ-कहाँ समस्याएँ हैं, फिर उसी का आप प्रार्थना कर लेते हैं, स्वस्थ होने का संकल्प कर लेते हैं दरबार से।

दरबार ने शक्ति आपको दे रखी, ऊर्जा दे रखी, आपके कष्ट नष्ट हो जाते हैं।

बहुत से लोग तमाम नकारात्मकता से जुड़े हुए हैं।

फिर जब हमसे बताओ कि आप गड़बड़, अरे नहीं साहब, हमको तो गड़बड़ ही करते हैं।

अब चोर कब कहेगा मैंने चोरी की?

नकारात्मकता कब कहेगी कि मैं नकारात्मक हूँ?

बहुत भावुकता में बोलते हैं, गहरा संकल्प करते हैं और भय और लालच से बाहर निकलकर जब आते हैं, जैसे ही भय और लालच से बाहर निकलते हैं, उनका मुँह, उनका अहंकार, सब तिरोहित हो जाता है, सब नष्ट हो जाता है।

और पहली बार वो दूर खड़े होकर के दौड़ से दौड़ रहे लोगों को देख पाते हैं और अपनी कमियों को समझ पाते हैं।

OTHER SPEAKER:

ठीक कहते हैं। समाज में नकारात्मकता समझने-सुनने नहीं देती।

GURUDEV:

राजू भैया?

OTHER SPEAKER:

जी गुरुजी।

GURUDEV:

मैं रोज़ इन चीजों को चैलेंज रूप में देता हूँ। चीजें आती हैं सामने और वो इतनी खतरनाक हैं, जो ना तो चर्चा करने योग्य है और ना ही उसका बताना कोई प्रासंगिक बात है, कोई ऐसा नहीं।

लेकिन वो इतनी खतरनाक हैं कि अगर व्यवस्था न बनी हो पहले से, तो क्षण में सृष्टि को नष्ट कर सकती हैं, इतनी ताकतवर हैं।

OTHER SPEAKER:

ठीक कहते हैं।

GURUDEV:

लेकिन व्यवस्था तो व्यवस्था है।

OTHER SPEAKER:

जी।

GURUDEV:

जंगल भरा पड़ा है शेरों से, तमाम प्रकार के जीव-जंतुओं से, हिंसक जीव-जंतुओं से, भरा तो पड़ा है ना जंगल।

OTHER SPEAKER:

जी गुरुजी।

GURUDEV:

लेकिन व्यवस्था आपके शहर में नहीं आती जल्दी।

OTHER SPEAKER:

जी। अनुकूल नहीं है।

GURUDEV:

बिल्कुल। और जंगल हमारे अनुकूल है लेकिन उसको हम अपने भय और लालच से तोड़ते हैं।

OTHER SPEAKER:

ठीक कहते हैं। जी गुरुजी। समस्याएँ हमने स्वयं बना रखी हैं। बिल्कुल, जी गुरुजी।

GURUDEV:

जब मैं कहता हूँ उत्तर पहले से रखा हुआ है, प्रश्न बाद में आया है।

OTHER SPEAKER:

बिल्कुल गुरुजी।

GURUDEV:

और से बाद में आपने पैदा किए, पहले से व्यवस्था थी, पहले से समाधान था।

OTHER SPEAKER:

जी।

GURUDEV:

कोरोना काल देखिए ना, पहले से नदियाँ शांत थीं, पहाड़ शांत थे, जंगल शांत थे, सब कुछ शांत था, वायु प्रदूषण नहीं, जल प्रदूषण नहीं, पहले से शांत था, आईना था देखने के लिए।

OTHER SPEAKER:

जी गुरुजी।

GURUDEV:

बहुत सुंदर, बहुत सुंदर। ट्रांसलेट। आपका जो ज्ञान ट्रैक काफ़ी तेज काम कर रहा है। Your system is working perfectly. Good, good translate.

OTHER SPEAKER:

जय गुरुदेव। मेरा काम आसान हो गया, गुरुदेव।

GURUDEV:

आपका काम आसान हो गया।

OTHER SPEAKER:

जी।

OTHER SPEAKER:

अभी पार में जो सेवक हैं, आपने राउंड का सभी देखा होगा, तो अभी लिखा है कि इस पूरे चर्चा में तीन बिंदु जो मुख्य रूप से सामने आए हैं।

GURUDEV:

जी।

OTHER SPEAKER:

वो आया कि आयव्यवस्था को केवल शक्ति है ना नकारात्मक है, न सकारात्मक है। बहुत अच्छा है। अस्ति। हम जैसे होते हैं शक्ति वैसा ढल जाती हैं।

दूसरा, कि हमारे भाव और विचार के अनुसार वो कार्य करती है, पौत्री के अनुसार वो करती है और दिशा तय करती है।

GURUDEV:

बिल्कुल।

OTHER SPEAKER:

और मनुष्य आव्यवस्था करता है, सब पहले सही व्यवस्था।

GURUDEV:

जी।

OTHER SPEAKER:

अगर आव्यवस्था करता है तो मनुष्य करता है। और जब वो शक्ति आव्यवस्था को व्यवस्थित करती है तो मनुष्य फिर लाता है, भागता है, बचाओ-बचाओ करता है।

GURUDEV:

जी।

OTHER SPEAKER:

लेकिन शक्ति को उससे कोई इफेक्ट नहीं पड़ता। वो तब तक नहीं रुकती जब तक कि वह आव्यवस्था को व्यवस्था में नहीं बदलती।

GURUDEV:

बहुत अच्छा।

OTHER SPEAKER:

हम अपने हाल-चाल को अपने संचय से मानते हैं, संघर्ष से अपने हाल तक पहुँचते हैं। लेकिन सृष्टि को, शक्ति को उससे कोई इफेक्ट नहीं पड़ता।

आप देखिए, जैसे अभी आप सब लोग दरबार में भी जुड़े हैं, सभी लोग जुड़े हैं, पुरुषोत्तम जी, सरिता भी जुड़े हैं, मेरे ख्याल से, मैंने उनसे...

इसमें जो जुड़े हुए हैं, गुरुदेव अमेरिका, कनाडा, इंग्लैंड, जर्मनी, पोर्चुगल, चेक रिपब्लिक, ऑस्ट्रेलिया, नेपाल, भूटान, इतने देशों से लोग जुड़े हुए हैं, सब लोग। कतर। सब लोग जुड़े हुए हैं और सभी लोग इस चर्चा में अपना-अपना मंथन कर रहे हैं।

GURUDEV:

मंथन ही इसका सबसे महत्वपूर्ण पार्ट।

बिल्कुल। मंथन तब होगा जब आपने ठीक से श्रवण किया है, ठीक से सुना है।

श्रवण के दौरान मनन नहीं करना है। श्रवण के दौरान, सुनने के दौरान सिर्फ सुनना है।

OTHER SPEAKER:

जी।

GURUDEV:

पूरा रिकॉर्डर बन जाइए। एकदम जो बोला जा रहा है, एक-एक शब्द को उतार लीजिए अंदर।

जब रुक जाएँ तो फिर मनन का समय आता है। फिर आपको उसको मनन करिए, अंदर ले जाइए गहरे में, हाँ और नालाय क्या है।

फिर स्वीकारोक्ति भाव आएगा, फिर आश्रवण है।

तो जैसे भी आप सभी लोग जुड़े हैं, एक भी नकारात्मक भाव-विचार किसी भी नहीं आता, किसी के प्रति नहीं।

न भूत में आप घूम रहे हैं, न भविष्य में घूम रहे हैं।

OTHER SPEAKER:

जी।

GURUDEV:

आप अपने वर्तमान में बने हुए हैं और हर व्यक्ति ऐसे ही रहना चाहिए था, जैसे इस समय आप बने हुए हैं।

OTHER SPEAKER:

जी।

GURUDEV:

कि हर व्यक्ति की आकांक्षा है, महत्वाकांक्षा है, ऐसे ही बना रहे, कोई नकारात्मकता उसको छुए।

लेकिन ऐसा कब होता है?

जब आप व्यवस्था के एकदम नज़दीक होते हैं। तो आप व्यवस्थित हो जाते हैं। जैसा भी आप हैं वही व्यवस्था।

जितना दूर चले जाते हैं इस केंद्र से, वैसे ही धीरे-धीरे आप व्यवस्थित होना शुरू होता है। ये दरबार आपको तोड़ता है और आपको व्यवस्था के नज़दीक लाता है। तभी आप महसूस कर पाते हैं कि बहुत अच्छा लग रहा है, बहुत अच्छा हो रहा है।

ये तभी निकलता है अंदर से जब आप व्यवस्था में होते हैं।

तो व्यवस्था में बने रहने के लिए व्यवस्था के नज़दीक जाना होता है और व्यवस्था के नज़दीक जाने के लिए आपको द्रष्टा भाव में जाना होता है, साक्षी भाव में जाना होता है, कर्ता भाव से अपने को तोड़ना होता है।

जैसे-जैसे हम अपने आप को, "मैं ऐसा करता हूँ", "मैंने ये किया", "मैंने वो किया" से आप बचने लगते हैं, बचते आते हैं, टूट जाते हैं।

तो उसी समय में आता है कि आपका द्रष्टा भाव धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा है।

तो साक्षी भाव है जो आपको ध्यान की ओर ले जाएगा और जितनी भी कूतन-फूतन हुई, वो भी सारी ध्यान के दौरान ही होती है।

जब हम शिव और शक्ति की बात करते हैं तो हम एक्चुअली में व्यवस्थापक और व्यवस्था की बात करते हैं।

शिव व्यवस्था हैं, शक्ति व्यवस्थापक हैं।

शिव स्वयं व्यवस्थापक हैं और शक्ति व्यवस्था है ऐसा नहीं है। इसलिए थोड़ा उल्टा करना है।

जो व्यवस्थापक है वो क्रियाशील। जो व्यवस्था है, वो अक्रियाशील।

इसको करेक्ट कर लो, please, ट्रांसक्राइब।

OTHER SPEAKER:

बतायें कुछ बिंदु और इस चर्चा में निकले हैं, वो ये कि समस्या स्वयं में है, बाहर नहीं और स्वयं में समाधान।

दूसरा है कि एक स्मृति से मुक्ति हो सकती है और एक दूसरी ऐसी स्मृति नकारात्मक हो सकती है जिससे सब फसाद बन सकता है, अवरोध बन सकता है और हमेशा के लिए डिस्ट्रॉय हो सकता है।

एक तीसरा बिंदु निकला कि मुक्ति में बाधा के दो ही कारण हैं, एक भय और दूसरा लालच। ये समस्या के कारण हैं।

और एक जो बिंदु निकला कि जो उपचार है और जो पूर्ण समाधान है, वो तभी होता है जब समस्या का निदान ठीक से हो जाए, डायग्नोसिस उसका पूरा हो जाए, तो समस्या का निवारण भी हो सकता है।

तो बहुत ही सुंदर चर्चा चल रही है।

OTHER SPEAKER:

कोई विशेष प्रश्न कहीं से, किसी का सार्थक प्रश्न, पूरी चर्चा से संबंधित, जो भी चर्चा हुई, उससे संबंधित अगर कोई प्रश्न किसी मुख्ताब, तो if you have any question, please.

If you have any question pertaining to today's discourse of Gurudev, please do ask. Raise your hand.

GURUDEV:

मैं पावलीना से कहना चाहूँगा कि जैसे कुछ पिछले जन्मों के कुछ नकारात्मक रहता है, जब वो निकलती है तो कुछ नकारात्मक व्यक्तित्व हो गए, ऐसा प्रतीत होता है।

लेकिन एक्चुअल में वो नष्ट हो रहा होता है।

जैसे कुछ वर्तमान में भी हम ऐसी जगहों पर जाते हैं जहाँ पर जल और वायु का जो प्रभाव है हमारे मन पर पड़ता है।

कुछ क्षणों के लिए ऐसा हो जाता है, जैसे पावलीना शायद कुछ जलाशय जैसे बड़े स्थान पर गई, वो स्थान कुछ नकारात्मक थे और जिसके कारण इनमें थोड़ा सा बीच में वो आई, लेकिन इनकी साधना से वो नष्ट हो गया।

जब आप ध्यान साधना से जुड़े रहते हैं, तो सब चीजें धीरे-धीरे, धीरे-धीरे व्यवस्थित होती जाती हैं।

इसलिए कहा जाता है कि नियमित ध्यान साधना करनी है और इसे अपने जीवन में रोज के कार्यों के क्रम में जोड़ लेना है कि हमें ध्यान साधना भी करनी, चाहे वो दस मिनट ही क्यों न हो, लेकिन हमें करना है।

जैसे हम पानी पीते हैं, भोजन करते हैं, अन्यान्य कार्य करते हैं, ऐसे ही ध्यान साधना को भी अपने क्रम में शामिल कर लेना चाहिए।

बहुत से जो भक्त हैं दरबार के शिष्य बाबा के, क्रम से कर रहे हैं। जो नहीं कर पा रहे हैं, कोशिश कर रहे हैं। मुझे लगता है वो भी आगे सफल होंगे।

तो बहुत सुंदर...

चलिए, चर्चा-चर्चा रात भर करने का मन कर रहा है आप सबसे। लेकिन वो थोड़ा सा समय का प्रतिबंध है, तमाम चीजें जो है भी सृष्टि में आतुर हैं गति तोड़ने के लिए।

मैं आपसे बात कर रहा हूँ, लेकिन कोई मुझे कुछ संदेश है, उसको भी ठीक करना है।

हम लोग आज आप लोगों ने... मैं आशा करता हूँ कि सुबह आप लोगों ने आज रविवार की ध्यान साधना की होगी।

और ये ध्यान साधना बहुत ही अप्रतिम है। आप सभी इसको महसूस तक...

लोग बहुत इंतजार करते हैं पूरे विश्व में ध्यान साधना के समय में जुड़ने के लिए।

ठीक। तो सभी लोग करते रहें।

मेरा भी जो कुछ विचार बन रहा है, वैसे तो विचार नहीं बनता है कहीं बाहर जाने का, विदेश जाने का, लेकिन फिर भी दरबार के कार्य के लिए और माँ के आदेशों के, बाबा के आदेशों के पालन के लिए...

मुझे लगता है जाना ही होगा।

अगला जो करके मनाएंगे हम लोग अमेरिका का और यूरोप का बनाएंगे, चेक गणराज्य का बनाएंगे, तो चीजें और फैलेंगी।

जो बहुत लोग नहीं आ पाते दरबार दूरी होने की वजह से, आने संकटों की वजह से और अनेक समस्याओं के कारण, उनके भी नजदीक पहुँचेंगे।

चीजें व्यवस्थित हों और लोग अपने-अपने अधिकार पर चीजों को आगे ले जाएँ।

इस काबिल सब बनते जा रहे हैं, धीरे-धीरे, धीरे-धीरे बन रहे हैं।

और मुझे लगता है कि 2027 के एंड तक बहुत कुछ सृष्टि में चेंजेस आएंगे।

जो अच्छा चाहते हैं, अच्छा होना चाहते हैं, बहुत अच्छा हो जाएगा।

और बहुत अच्छा समय आने वाला है सृजन का। उसमें विध्वंस भी होंगे। विध्वंस भी सृजन का एक पार्ट है।

तो इसलिए बहुत चिंतित नहीं होना है, अपने को ध्यान रखना है।

घटनाएँ हैं गति होने के लिए, वो गति होंगी।

चिंतित नहीं होना है, उसको लेकर चिंतन करना है, ठीक हो जाएगा।

जब चिंतित शब्द का इस्तेमाल हम लोग करते हैं, इसका मतलब हम स्वयं के बारे में सोच रहे होते हैं, अपने से रिलेटेड लोगों के बारे में सोच रहे होते हैं जो हमारे संपर्क में हैं।

चिंतन करते हैं हम समग्र सृष्टि के बारे में, हम उसके कल्याण के बारे में सोच रहे होते हैं, तो तब चिंतन शब्द का इस्तेमाल किया जाता है।

तो चिंतन पर ध्यान देना है।

चिंता उसी में इम्बिल्ट रहती है, तो परेशान नहीं करती है।

इसलिए सभी को ये समझना होगा कि हममें सुधार की आवश्यकता है, स्वयं में सुधार की आवश्यकता है।

हम दूसरों से सुधार की अपेक्षा इस अर्थ में कर सकते हैं कि जब हम सुधर गए हैं तो दूसरा सुधरेगा ही। बिल्कुल।

इस परिप्रेक्ष्य में हम अपेक्षा नहीं कर सकते कि हम खराब बने रहें और दूसरा अच्छा व्यक्ति बनकर के और आपके साथ खराब आपको सहयोग करें।

ऐसा बहुत कम होता है।

बहुत हागिशारी लोग होते होंगे जिनके अगर ऐसा हो जाता है, उनका ये बहुत खराब आदमी है और उसे अच्छे सपोर्ट करें।

तो बहुत अच्छा है।

आप सभी के अंदर में तमाम प्रश्न होंगे, लेकिन इस बात को ध्यान रखो कि जितने भी प्रश्न आपके अंदर हैं, बहुत गहराई से इस स्मृति को अंदर ले जाओ, उन सब के उत्तर भी आप ही के अंदर हैं।

लेकिन वो उत्तर स्वयं के अंदर है। आप खोजेंगे, आपको मिलेंगे।

आप जब उत्तर की अपेक्षा बाहरी व्यक्ति से करते हैं, तो फिर द्वंद्व पैदा होता है क्योंकि आपके अंदर के उत्तर से बाहर का उत्तर जब नहीं मिलता, तो अस्वीकृति का भाव आता है और फिर द्वंद्व पैदा होता है, फिर और श्वासें बड़ी हो जाती हैं।

इसलिए अपने ही अंदर के उत्तर से संतुष्ट होना है। आपका उत्तर आपके अंदर स्वयं में।

महापुरुषों का काम इतना ही रहा है कि आपके वास्तविक उत्तर से आपका परिचय करा देना, आपके समाधान से परिचय करा देना।

यही महापुरुषों का काम रहा है।

मेरा ऐसा मानना है कि पूरी सृष्टि में प्रत्येक मानव स्वस्थ रहना चाहता है, सुखी रहना चाहता है, शांति से रहना चाहता है, किसी को परेशान नहीं करना चाहता है, परेशान होना नहीं चाहता है।

ये एक व्यवस्था है और इस व्यवस्था में जो जी रहा है उसके साथ जीने में बहुत सुख है।

जो ऐसा नहीं जी पा रहा है, उसके प्रति अगर हमारे अंदर सहानुभूति है, तो हम उसको सहयोग करते हैं।

अगर हमारे अंदर उसके प्रति नकारात्मकता है, तो ये नकारात्मकता उसकी नहीं है, ये नकारात्मकता आपकी है।

कि आपके अंदर सहानुभूति के स्तर पर उसका हासिल होना या उसे शोषण करना, या हम कहें अच्छा ठीक है, जाओ नष्ट हो जाओ, तुम ऐसा करोगे तो ऐसा कहकर पल्ला झाड़ लेना, ये दिखाता है कि हमारे अंदर अभी भय और लालच और नकारात्मकता का पूरा प्रभाव अभी है।

जिस दिन आप किसी भी दुखी व्यक्ति को, किसी भटके हुए व्यक्ति को रास्ते पर लाने के लिए, जो परिवार का नहीं है, जो मित्र नहीं है, ऐसा व्यक्ति, उसके लिए भाव चार अंदर करने लग जाएँ, सहानुभूति आ जाए कि ये भी मेरा जैसा हो जाए, अच्छा हो जाए, कितना सुंदर हो।

मैं समझ सकूँ, ये भी समझ पाए कितना सुंदर है।

उसके लिए हम उसको सहायता करें, उसका सहयोग करें, उसका मार्गदर्शन करें, उसको दरबार से परिचित कराएँ, तो ये बड़ा पुण्य का कार्य है।

और उससे ये प्रतीत होगा और इससे आपको प्रमाण मिलेगा, आप भय और लालच से दूर होते जा रहे हैं।

नकारात्मकता आपसे दूर होती जा रही है और आपका साथी बनो।

द्रष्टा भाव आपका मजबूत होता जा रहा है।

हरिः ओम। बहुत-बहुत धन्यवाद।

आप सभी लोग बहुत अच्छे से समझ पा रहे हैं क्योंकि आप जाग्रत हैं। इसलिए ठीक से बात को समझ पा रहे हैं। समझकर के वैसा जी पाएंगे।

यही उद्देश्य है चर्चा का और साधना का।

साधना का मतलब ही होता है बैलेंस। साध रहे हैं। न पलड़ा नीचे न कोई पलड़ा ऊपर, इक्वल है, बराबर।

साधना का अर्थ यह होता है कि हम सम्यक दृष्टि से चीजों को देख पा रहे हैं।

ऐसा प्रयास करते हैं। धीरे-धीरे प्रयास प्रयत्न में परिणत हो जाता है, क्रिया से आगे बढ़ जाता है।

तो बहुत सुंदर है कि आप सब जुड़ रहे हैं।

अभी तक लगभग, मेरे ख्याल से तीन सौ लोगों के आसपास। कौन है तीन सौ, तीन सौ लोग के आसपास। ठीक। देश-दुनिया से लोग जुड़े हैं।

ये दिखाता है कि अंदर प्यास है रास्ता जानने का। अंदर एक घेन, अंदर गहरे में बहुत इच्छा है समझने की, समझ के जीने की इच्छा है।

सब कुछ एक दिन में नहीं होता इस महान जाति में, समाज में।

धीरे-धीरे-धीरे, जैसे-जैसे आप समझते जाते हैं, वैसे-वैसे आप परिवर्तित होते जाते हैं।

जब आप पाँच साल के उम्र के थे, तब आप कुछ और सोचते थे।

बीस साल के उम्र, तो जैसा सोचते थे वैसा हुए।

आज पचास साल की उम्र में, साठ साल की, पैंसठ साल की, अठसठ साल की उम्र में जो आप जैसा सोचते हैं, वैसा जीते हैं।

आप पाँच वर्ष में जैसा जीते थे, दस वर्ष में जैसा जीते थे, आज से तुलना करें, बहुत बड़ा गैप है, बहुत डिफ्रेंस है।

जैसा-जैसा आप समझते गए, आपके आँखों में आता है।

तो हम आशा करते हैं कि आगे भी जैसा-जैसा आप अच्छा अच्छा समझते जाएंगे, वो आपके आँखों में आता ही जाएगा।

इसके लिए कोई चिंतित होने की आवश्यकता है, चिंतित की आवश्यकता है और आप सब अच्छा कर पाएंगे।

दरबार आपके लिए, काव्यमाँ के सभी भक्तों के लिए, शिष्यों के लिए।

जो दरबार नहीं आए हैं, दूर से देख रहे हैं दरबार को, उनके लिए व्यवस्था को व्यवस्थित करने के प्रतिदिन कोशिश करता है।

रोज दरबार ऐसे ही घटना क्रम से भरा रहता है।

दरबार से बाहर का अगर व्यक्ति देखे, तो या तो हम लोगों को पागल समझेगा या वो खुद पागल हो जाएगा।

पूरी दुनिया में आकार बन सकता है, गिरदरवार की आंतरिक व्यवस्था को देख लें।

ठीक।

तो वही प्रश्न आएंगे या तो कहेंगे कि नाटक है, सब झूठ है, या तो आकार... ऐसा कैसे हो रहा है?

कभी-कभी रात्रि हो या कोई संवाद मिला है कि हमारे पीछे बैठते हैं।

दरबार के रात्रियों होने वाले कार्यक्रम शक्तियों को व्यवस्थित करने के क्रम में जो-जो हमने देखा है, उसकी कभी रात्रि हो या कभी जीवन में कल्पना ही नहीं की, भी ऐसा मिलता है, देखो गुरुदेव।

इसी कल्पना से बाहर।

लेकिन प्रमाण से पता लगता है उसके बाद कि हाँ हुआ, हुआ, सृष्टि में कुछ हुआ।

तो व्यवस्था है।

व्यवस्था में जीना सबको अच्छा लगता है, व्यवस्था में जीना चाहता है।

अपनी कोशिश है, दरबार की कोशिश है कि सबको व्यवस्था के बारे में बताया जाए, व्यवस्था का अनुभव कराया जाए, ताकि वो व्यवस्था के बारे में अनुभव करके उस प्रेरित हो सकें।

ठीक है।

बहुत अच्छा है चर्चा-वार्ता चलती रहे।

इसी प्रकार से सभी लोग जो पाए सबको समय बोलने का मिले, ये थोड़ा असंभव है।

लेकिन बैठ के चर्चा में, अगली चर्चा में वो कोई विषय होंगे, एजेंडा होंगे, जो पहले से डिक्लेयर रहेंगे कि इस एजेंडा पे चर्चा होगी, पहले से ही रहेगा।

तो सभी लोग जुड़ सकें और कमेंट बॉक्स में जा करके अपने प्रश्न छोड़ सकें कुछ।

तो उसको आगे की चर्चा में शामिल किया जाए, साथ है प्रश्न, जिससे लोगों को समझने में और आसानी हो।

अपने प्रश्न अपने नाम के साथ छोड़ सकते हैं।

और दरबार कुछ ऐसे कार्यों में व्यस्त है।

2027 जो है एंड तक लोग तंत्रक या योग के प्रति समर्पित हो सकेंगे और मनस बनेगा कि यही सही रास्ता है स्वयं के जीने के लिए, परिवार में सुख-समृद्धि और स्वस्थ बने रहने के लिए, समाज में अभय लाने के लिए, सुख-शांति लाने के लिए, पूरी सृष्टि में स्वयं का समायोजन करने की, सृष्टि को स्वयं में देखने की, सृष्टि में स्वयं को देखने, अपने में सृष्टि को देखने दृष्टि विकसित हो।

दरबार पूरी तरह प्रेरित कि आप और आपका परिवार सभी स्वस्थ रहें और सुखी रहें और सभी का मंगल हो सके, सभी का कल्याण हो।

ऐसा दरबार सतत प्रतिबद्ध, आपके साथ अच्छा अच्छा हो इसके लिए दरबार सतत प्रतिबद्ध रहता है, रात-दिन काम करता है।

एक हॉल में, कमरे में बैठ के रात में हम लोग दस-पंद्रह, बीस लोग बैठ के इस पूरी सृष्टि को देखने की कोशिश करते हैं, व्यवस्था को ढूंढते हैं, उसको व्यवस्थित करते हैं, नकारात्मकता को ढूंढते हैं, उसको सकारात्मक करते हैं, ताकि पूरी सृष्टि में सभी का जीना सरल हो।

क्योंकि सब जुड़े हुए हैं।

ये तो कहने को है कि हम लोग Zero Balance के कार्य में जुड़े हैं या श्री राधा माता जी संप्रदाय में जुड़े हैं।

लेकिन वास्तव में तो सब जुड़ा हुआ है, कोई अलग नहीं।

एक भी प्राणी, जीव जगत, कुछ भी अलग नहीं।

सबकी सांसें जुड़ी हैं।

कि हम जो खींचते हैं वायुमंडल से वापस फेंकते हैं वायुमंडल में, किसी में जाता है, किसी में आता है, किसी से मिलता है, किसी से आता रहता है।

सब कुछ जुड़ा हुआ है।

तो बहुत अच्छा है, सब लोग इसको चिंतन करेंगी जो आज चर्चा हुई।

ठीक है।

और कोई प्रश्न होंगे तो कमेंट बॉक्स में छोड़ेंगे।

OTHER SPEAKER:

जी गुरुदेव।

GURUDEV:

छोटा सा, बहुत सुंदर। अभी एक पंद्रह मिनट की ध्यान साधना भी करेंगे।

OTHER SPEAKER:

जी गुरुदेव।

GURUDEV:

सभी लोग उसके पहले हम चाहेंगे कि ये भी इसका ट्रांसलेट कर दें ताकि ठीक है, समाप्त।

OTHER SPEAKER:

शेयर करना चाहेंगे?

OTHER SPEAKER:

Yes, Guruji.

OTHER SPEAKER:

Guruji, सब लोग को हिंदी जानता है Guruji. वैसे attention... अभी तो मिस्टर जी ने अपना एक जुगाड़ बना लिया है। एक डिवाइस कि आप हिंदी बोलो, उधर वो अपना सारा चेक भाषा में, उनको सबको आ जाता है समझ में। तो बहुत सुंदर किया है, तो ट्रांसलेशन के काफी झंझट खत्म हो गए।

हिंदी सभी लोग समझ रहे हैं प्रेम से। सभी लोग।

OTHER SPEAKER:

Yes, Guruji. कहिए। बोलिए। पुष्टन जी बोलिए।

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