मई 2027 — महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव महाराज की पहली आधिकारिक यूरोप यात्रा।गुरुदेव की यात्रारुचि दर्ज करें
प्रवचन - गुरुदेव·

गुरु पूर्णिमा 2026
शिष्यों के साथ प्रवचन और सत्संग

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दरबार में आप सभी का पुनः बहुत-बहुत स्वागत है। गुरु पूर्णिमा महोत्सव को चार दिन तक मनाने का जो संकल्प है, आज उस महोत्सव का दूसरा दिवस है। आप सभी को बहुत-बहुत बधाई, गुरु-पर्व की बहुत-बहुत बधाई।

कल भी मैंने आपको परिचय कराया था — जिस अखाड़े से महामंडलेश्वर का अभिषेक हुआ, और जिनके द्वारा हुआ, वे मूर्तियाँ आज हमारे बीच में बैठी हैं। धनी दास जी महाराज हमारे बीच में नहीं हैं, वह पंजाब में हैं। हमारे श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण के पूजनीय मुखिया महंत जी श्री भगत राम जी हमारे बीच में हैं — सभी लोग स्वागत करेंगे। आदरणीय हैं, गुरु-तुल्य हैं। और हमारे बीच में अखाड़े के सचिव, महंत श्री जगतार मुनि जी हैं।

हमारे अखाड़े में आपको साधारण लोग दिखेंगे, लेकिन प्रतिभा असाधारण है, काम सारे असाधारण हैं।

तो ऐसे अखाड़े में अभिषेक हुआ, वहाँ जाना हुआ, और सम्मिलित होना जीवन भर के लिए हुआ। जहाँ से पूजनीय बाबा जी जुड़े रहे। और इसी अखाड़े से अपने बाबा के भी जो गुरु थे, नागा, वह भी जुड़े रहे। इसलिए हमने इस परंपरा को अपनाया।

और बाबा का यही कहना है कि आप भी इसी तरह से श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन निर्वाण के भक्त हो, शिष्य हो, उसी परंपरा में हो। जो भी कभी बड़े कार्यक्रम हुआ करेंगे, या छोटे-छोटे शिविर भी लगेंगे, तो अखाड़े में भी लगेंगे — ताकि वहाँ से भी आप अच्छी तरह परिचित होते जाओ और परंपरा को आगे बढ़ने में बल मिले।

प्रवचन: संस्कार और आचरण

रात्रि में दरबार

हमारे तमाम महापुरुषों ने, गुरुओं ने बहुत प्रयास किया है कि मानव जाति का जीना सरल हो जाए। जीना कितना सरल हो, इस पर हमारे ऋषि-मुनियों ने बहुत काम किया — जिसके कारण हमारा जीना वाकई में सरल है। अगर हमारे महापुरुष नहीं होते, उन्होंने दुनिया भर के सुख-साधन, राजपाट छोड़कर जंगल और पहाड़ों को, एकांत को अपना निवास नहीं बनाया होता, तो आज हम सुखपूर्वक जीने की कला को कभी नहीं जान पाते।

तो सभी गुरुओं के प्रति अगाध श्रद्धा को प्रकट करने का यह गुरु पूर्णिमा जो होती है, वह तिथि है — कि हम अपने उन गुरुओं को नमन करें, उनसे प्रार्थना करें, संकल्प करें, जिन्होंने हमें जीने का रास्ता सिखाया।

यह देश ऋषियों-महर्षियों का देश है। गुरुओं का देश है। यह देश संस्कारों का देश है। यहाँ संस्कार से ही सब चलता है। जो संस्कारी व्यक्ति है, वह मनुष्य कहलाता है, मानव कहलाता है। जिसके पास संस्कार नहीं है — शरीर चाहे भले मनुष्य का हो — लेकिन वह जानवर या राक्षस कहलाता है।

तो संस्कारों को पहचानना है। बात को गहराई तक ले जाना है। पहला काम — ठीक से सुनना है, सुनकर मनन करना है। मनन करने के पश्चात आगे की प्रक्रिया शुरू होती है: जब आपको बोध हो जाता है कि यही सत्य है, तो फिर आपका संकल्प होता है कि ऐसे ही जीना है। और फिर जब आप वैसे ही जीते हो, तो उसे आचरण कहते हैं। उसे संस्कार कहते हैं।

आपके संस्कारों से, आपके आचरण से प्रभावित होकर आपकी अगली पीढ़ी सही से जी पाती है, सुखपूर्वक जी पाती है, आपके बताए गए रास्ते पर चल पाती है। लेकिन यदि आप ही ठीक से नहीं चल पाए, तो अगली पीढ़ी के अच्छे से चल पाने की आशा आप छोड़ दीजिएगा — क्योंकि जो कुछ उन पर जाएगा, आपसे ही जाएगा।

तो ध्यान रखना है कि हम अपने आचरण के प्रति हमेशा सतर्क रहें — क्योंकि आपके पीछे वाले आप पर नज़र बनाए हुए हैं। जैसे सबकी नज़र मेरे ऊपर रहती है: गुरु जी क्या कर रहे हैं, गुरु जी गड़बड़ करें तो अभी टोकें। और मैं नज़र गड़ाए रखता हूँ कि तुम गलत करोगे तो तुरंत डाँटूँगा — एकदम इमीडिएट, बहुत तगड़ी डाँट।

तो एक-दूसरे पर नज़र बनाए रखो। गुरु गड़बड़ करे, उसे रोकने और टोकने में एक सेकंड का भी संकोच मत करो। तुरंत टोक दो: “गुरु जी, मुझे आपकी यह बात अच्छी नहीं लग रही। अगर आप यह कर रहे हो तो बताओ, ऐसा क्यों?” कारण ज़रूर जान लो।

जैसे आप मेरे सामने खड़े होते हो, कभी-कभी आपके बीच में से कई लोग कहते हैं: “गुरुदेव, बड़ा कष्ट है।” तो मैं कहता हूँ: “आप बताओ, क्या गड़बड़ किया?” — “गुरु जी, कोई गड़बड़ नहीं।” तब फिर हम बताते हैं कि तुमने यह-यह गड़बड़ की। कहते हैं: “हाँ गुरु जी, की।” तो उसका फल कौन भोगेगा? आप। गुरु करेगा तो गुरु भोगेगा — और गुरु को ज़्यादा बड़ा दंड है। शिष्य को थोड़ा दंड मिलता है, अगर गुरु गड़बड़ करता है तो उसको कठोर दंड मिलता है। हमेशा ध्यान रखो।

आप भी बाबा के शिष्य से धीरे-धीरे गुरु बनने की तरफ़ बढ़ रहे हैं। हर व्यक्ति में भक्त होने की, शिष्य होने की और गुरु होने की क्षमता पूरी तरह विद्यमान है। उसका बीज विद्यमान रहता ही है। जो ठीक से प्रस्फुटित हो गया, वह अच्छा भक्त बनता है, अच्छा शिष्य बनता है और पूर्ण गुरु बनता है — बाबा की तरह।

यह पूरी प्रक्रिया है। जैसे बच्चा आज पैदा हुआ, धीरे-धीरे बड़ा होता है, बूढ़ा होता है — ऐसे ही आप में जब अच्छे संस्कार होते हैं, तो आपकी अगली पीढ़ी उसका अनुसरण करती है। वह अनुसरण करने के लिए बाध्य है। इसलिए अपने आचरण पर हमेशा ध्यान रखना है। सतर्क रहना है कि कभी कोई गलती न हो जाए।

छोटे पुत्र और झूठ की घटना

एक बहुत छोटी घटना बताते हैं।

पूजन के समय गुरुदेव एक बालक के साथ

हमारे बड़े पुत्र, जो लो भैया हैं, बहुत छोटे थे — उम्र रही होगी करीब दो वर्ष। हम चारपाई पर उनके साथ कुछ बात कर रहे थे या खेल रहे थे। तब तक धर्मपत्नी जी आईं, उन्होंने हमसे कोई बात करनी शुरू की, और इसी बीच फोन की घंटी बज गई। तब मोबाइल फोन होते नहीं थे — वह घनघनाने वाला फोन घर में होता था।

वह हमसे कुछ बात करना चाह रही थीं, तो मैंने कहा: “फोन उठाकर कह दो कि अभी बाथरूम में हैं, बाथरूम से निकलेंगे तो बात करेंगे।” मैंने इतना ही कहा और वह फोन की तरफ़ चली गईं।

लो भैया ने हमको ऐसे देखा — मेरे चेहरे की तरफ़। जैसे ही मेरे चेहरे की तरफ़ देखा, मैं अंदर से काँप गया। मैंने झूठ बोला — और यह इस बच्चे के अंदर तक पहुँच गया। यह जान गया।

मैं फटाफट उठा और तौलिया समेटते हुए बाथरूम में घुस गया: “जल्दी लाओ, बाथरूम, स्नान करके आता हूँ।” मैंने बात को बनाने की कोशिश की कि हम वाकई में बाथरूम में हैं।

मैं जब नहा-धोकर निकल के आया और नाश्ता करने बैठा — मेरे साथ वे भी बैठते थे, कुछ खाते थे — तो पहला वाक्य था: “पापा, अभी आप झूठ बोले थे।” हमने कहा: “हाँ। सॉरी।” — “कोई बात नहीं,” और खाने लग गए। बात ख़त्म हो गई।

यहाँ पर अगर बात हम छुपाने की कोशिश करते — “नहीं-नहीं, मैं झूठ नहीं बोला था, मैं तो नहाने चला गया था” — तो उस छोटे से बच्चे ने आपको पकड़ लिया कि आप झूठ बोल रहे हो। छोटी-छोटी बातें बच्चे नोटिस करते हैं। आपको लगता है, छोटा है, यह क्या जाने, बच्चा है। अरे, बच्चा नहीं है। कभी आपका बाप भी रहा होगा वह — यह भी ध्यान रखो। कभी दादा रहा होगा, परदादा रहा होगा, कभी गुरु रहा होगा। आज आपका बच्चा है।

तो इस बात का हमेशा ध्यान रखना है, अपने आचरण के प्रति बहुत सतर्क रहना है। आपको गर्व से मैं कहना चाहूँगा — लो भैया आज तक अपनी लाइफ़ में कभी झूठ नहीं बोले। लंदन से पढ़कर वापस आ गए थे, लेकिन अपने घर के काम में ही लगे रहे। आज भी लगे हैं। दरबार के पीछे का काम सँभालते हैं, उनके साथ पूरी टीम है। और दरबार के जो आगे के कार्य हैं, वे सब दरबार के सेवक हैं, बच्चे हैं — यह सँभालते हैं।

तो आचरण जैसा होगा आपका, अगली पीढ़ी उसको वैसा ही स्वीकार करेगी, वैसा ही आपको व्यक्ति बना हुआ मिलेगा। माता-पिता कहते हैं: “मेरा बच्चा बहुत बदमाश है।” शुरू में आते थे तो मैं कहता था: “अपने को चेक करो, ख़ुद को चेक करो। बदमाश बच्चे नहीं थे, बदमाश तुम थे, इसलिए बच्चे बदमाश हुए।” बच्चे कहाँ से लाएँगे? आपने आचरण सही से प्रस्तुत नहीं किया बच्चे के सामने, इसलिए बच्चे का आचरण गड़बड़ हो गया।

इसलिए हमेशा अपने आचरण पर ध्यान देना है। आचरण अगर आपका ठीक है तो आपका जीना भी सरल होगा। पिछली पीढ़ी — जो माता-पिता हैं — उनका जीना सरल होगा। अगली पीढ़ी — जो बच्चे हैं — उनका जीना भी सरल होगा। उनके बच्चे आगे आएँगे, उनका जीना बहुत सरल होगा।

सेवा और साधना

माला ग्रहण करता हुआ सेवक

साधु-संतों की सेवा, समाज की सेवा, दीन-दुखियों की सेवा, महापुरुषों की सेवा — सेवा से आपकी बुद्धि प्रखर होती है, बुद्धि तेज़ होती है, बुद्धि शुद्ध होती है। और जो आप ध्यान-साधना करते हो, ध्यान-साधना से आपका जो चित्त है, जो आपका कारण शरीर है, वह शुद्ध और पवित्र होता है। नकारात्मक, रोगी स्मृतियाँ नष्ट होती हैं। अच्छी स्मृतियाँ ही बचती हैं, जिनके आधार पर आपका जीना और सरल हो जाता है।

तो सेवा भी ज़रूरी और साधना भी ज़रूरी। दोनों काम ज़रूर करने हैं।

भक्त से शिष्य

मेरे द्वारा, इस शरीर के द्वारा जो दीक्षा मिलती है बाबा की ओर से, उसे आप ग्रहण करते हो — और बाबा के भक्त से आप बाबा के शिष्य हो जाते हो।

आप जब पहली बार दरबार आए, तो कितने कष्टों में थे? हाथ उठाएँ, कितने लोग कष्ट में थे। जब पहली बार आए, भयानक कष्टों में थे। और आज — बाबा का नाम लेते ही किसके कष्ट छूमंतर हो जाते हैं? सबके हो जाते हैं। माँ का स्मरण किया, बाबा का स्मरण किया — रोगी स्मृति नष्ट हो गई, आपके कष्ट चले गए। आज कितने लोग आनंद में हैं — हाथ उठाएँ — बाबा-माँ की कृपा से। सब आनंद में, आनंद ही आनंद है।

इस आनंद को बनाए रखना है। इस आनंद को बढ़ाते जाना है। इस आनंद को चारों ओर बिखेरते जाना है और अपने आप को सिद्ध करना है कि हम सच्चे गुरु के, पूर्ण गुरु के शिष्य हैं।

गृहस्थों के सम्मान पर

दरबार में एक श्रद्धालु

बहुत से लोग प्रश्न उठाते हैं। एक शंकराचार्य महोदय थे — बड़े सम्माननीय, आदरणीय, पूज्य संत। वह गृहस्थों को ऐसे देखते थे जैसे कोई कुत्ता-बिल्ली आ गया हो। पूछते: “गृहस्थी हो कि संन्यासी?” किसी ने कहा “गृहस्थी” — “पीछे बैठो, वहाँ चलो, उधर बैठो। आप संन्यासी, यहाँ बैठो।” गृहस्थों को बाहर बिठा देते: “कल आएँ, परसों आएँ, अभी टाइम नहीं है।”

मैंने कहा: “भाई, गृहस्थों के प्रति इतना विरोध-भाव क्यों है? यह गृहस्थी ही आपके जन्म का आधार है। इसने यह शरीर दिया है। इनका सम्मान करना सीखो। गृहस्थी नहीं होते तो तुम पैदा कहाँ से होते? तुम कहते हो गृहस्थी नीच है — ऐसा कहकर तुम अपने माता-पिता को गाली दे रहे हो। तुम्हें होश है, तुम क्या बोलते हो?”

गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा आश्रम माना गया है — प्रमाण प्रस्तुत करने का, जीने का, परीक्षा देने का। अगर गृहस्थ आश्रम में पास नहीं हुए तो समाज में कभी पास नहीं हो सकते। समाज में पास नहीं हुए तो गुरु की कक्षा में कभी पास नहीं हो सकते। ध्यान रखना।

तो पहले स्वयं में पास होना है, परिवार में पास होना है — वहाँ की डिग्री लेनी है। उसके बाद समाज में पास होने की डिग्री लेनी है। और सेवा की, तो साधना की डिग्री अपने आप मिल जाती है — गुरु के सामने कुछ कहना नहीं पड़ता।

ध्यान रखो, हमारे जो आदि शंकराचार्य जी भगवान थे, जिनकी मूर्ति आश्रम के अंदर लगी है — वह सीधे बाल्यकाल में, जब आदमी अपने को ठीक से सँभाल भी नहीं पाता, उस उम्र में संन्यास ले लिया। तो दो आश्रम उनके बीच में रह गए: गृहस्थ आश्रम और वानप्रस्थ आश्रम। चार आश्रम हैं — पहला ब्रह्मचर्य आश्रम, दूसरा गृहस्थ आश्रम, तीसरा वानप्रस्थ आश्रम, चौथा संन्यास। हमारे महापुरुषों ने चार आश्रम बनाए — पच्चीस-पच्चीस साल चारों में, सौ साल की औसत आयु उस समय मानी गई थी।

पता है क्या हुआ? आदि गुरु शंकराचार्य भगवान को एक राजा के शरीर में प्रवेश करके गृहस्थ आश्रम के सारे सुख-दुख, सबका अनुभव करना पड़ा। वापस आए, समाज को देखना पड़ा, समाज का अनुभव करना पड़ा, वानप्रस्थ का भी। दो अनुभव करके आए, तब वह महाविद्वान मंडन मिश्र को और उनकी धर्मपत्नी को हरा पाए — नहीं तो ख़ुद हार गए थे।

ये चार आश्रम हैं। तो हमें सबका सम्मान करना है। मनुष्य मनुष्य है — वह गृहस्थी में है चाहे संन्यास में, चाहे भक्त है, चाहे शिष्य है, चाहे गुरु है — हमें हर मानव का एक ही दृष्टि से, बराबर से सम्मान करना है। गड़बड़ हो तो सहानुभूति रखनी है और उसको ठीक करने की कोशिश करनी है। ईर्ष्या से, द्वेष से जो बिगड़ा है वह सुधरेगा या नहीं, पता नहीं — आपका पहले बिगड़ जाएगा। इसलिए ईर्ष्या-द्वेष से बचना है। जो गड़बड़ है उसको सुधारना है।

हमारे बीच में तमाम टीम रहती है। “यह गड़बड़ कर रहा है, यह गड़बड़ कर रहा है, निकालो इसे, भगाओ।” मैं एक ही बात कहता हूँ: “सुधार लो। सुधारो इसको, यह सुधर जाएगा, अच्छा हो जाएगा।” दूसरा आएगा, इसकी क्या गारंटी कि अच्छा ही होगा? पता लगे कि जिंदगी भर सबको सुधारते ही रहे। जो है उसी को सुधार लिया जाए — जीना सरल हो जाता है।

बच्चे बदमाशी कर रहे हैं? सुधार लिया जाए। बच्चे तो आप बदल नहीं सकते। ऐसा तो नहीं कि परचून की दुकान में गए और कहा: “भैया, ज़रा हमारा बच्चा बदल के दे दो।”

तो संस्कारों का अपने प्रति पहले ध्यान रखना है — कि मेरे ख़ुद के संस्कार कैसे हैं? मेरी ख़ुद की सोच कैसी है? और ध्यान रखो, जैसी आपकी सोच होगी, जैसे आपके स्वयं के संस्कार होंगे, वैसी ही अगली पीढ़ी होगी। आपका बनाया हुआ संसार होता है। बाहर से कुछ नहीं आता, सब अंदर से ही जाता है। तो अपने प्रति सतर्क रहना है — अगली पीढ़ी अपने आप अच्छी होगी।

आदतें और छुपी हुई स्मृति

भाई, दारू पीते हो, माँस-मदिरा खाते हो? छूट जाए, अच्छी बात है — संकल्प कर लो। नहीं छोड़ोगे, सामने आएगा तो छूट तो जाएगी ही; बचने का सवाल ही नहीं है।

कभी-कभी मैं देखता हूँ — कोई शराब छोड़ना चाहता है, बेचारा संकल्प करता है, छूटती नहीं। पत्नी चिल्लाती हुई आती है: “गुरुदेव, यह शराब नहीं छोड़ते!” और हम देखते हैं — शराब पीने वाली स्मृति तो इनकी पत्नी के अंदर है। और संकल्प बेचारा पति कर रहा है: “मेरी शराब छुड़ा दो।” किसकी छुड़ाएँ? मैं पत्नी से कहता हूँ: “तुम संकल्प करो कि मेरे पति की शराब छूट जाए।” और जहाँ पत्नी संकल्प करती है — शराबी ग़ायब, स्मृति नष्ट।

ऐसे स्मृतियाँ छुपी रहती हैं, छुप-छुप के वार करती हैं। तो सब अच्छा होने के लिए है। सारा ही कुछ एक तंत्र है।

“तंत्र” शब्द पर

तंत्र शब्द का अर्थ ही व्यवस्था है। यह “तंत्र” जिस भी शब्द के आगे लग जाता है, वहाँ व्यवस्था दिखाई देने लगती है — जैसे लोकतंत्र, स्वतंत्र, राजतंत्र। जहाँ तंत्र लग जाता है, वहाँ व्यवस्था दिखाई देने लगती है। यानी जो व्यवस्था है उसे तंत्र कहा गया; जो अव्यवस्था है उसे टोना-टोटका, झाड़-फूँक, जादू-टोना कहा गया।

तो तंत्र है एक व्यवस्था। व्यवस्था को अगर समझ लिया जाए तो उसमें जीना हो पाता है; और तंत्र के अनुसार हम जी पाते हैं तो उससे सुख निकलता है। और लगातार वैसा जीते रहते हैं तो सुख हमारा निरंतर हो जाता है। जो निरंतर सुख है, उसे ही आनंद कहते हैं। आनंद का अर्थ है वर्तमान में बने रहना।

तंत्र व्यवस्था है, तो व्यवस्था को समझना है। जब आप व्यवस्था को ठीक से समझ लेंगे, बुद्धि में उसका बोध हो जाएगा, साक्षात्कार हो जाएगा, तो आप वैसा जीना शुरू करते हैं। यही व्यवस्था है।

दीक्षा के प्रसंग में: तैयार होने का अर्थ

(मंत्र-दीक्षा के साथ दिए गए निर्देशों में से केवल व्याख्या के अंश; कर्मकांड की क्रियाएँ यहाँ नहीं दी गई हैं।)

पूजन के समय पीले वस्त्र में एक बालिका

जब भी कभी प्रार्थना का, पूजा का समय न मिले — सफ़र कर रहे हो, गाड़ी में, रेल में, हवाई जहाज़ में, पैदल; पूजा का समय नहीं है, स्नान-ध्यान नहीं हुआ है — तो जैसे अभी आपने आँख बंद करके भोलेनाथ का ध्यान किया, कल्पना में जल अर्पित किया, कल्पना में पुष्प अर्पित किए, कल्पना में ही भोलेनाथ को धूपित किया, बाबा-माँ को प्रणाम किया, दरबार को प्रणाम किया और आँख खोल दी — इतना ही कर लेने से आपकी पूजा-प्रार्थना दरबार स्वीकार कर लेता है। हो गई आपकी पूजा।

अब दो चीज़ें ध्यान देनी हैं — ध्यान देना है और ध्यान करना है। ध्यान देने के समय ध्यान देना है, और स्वयं पर जाने के समय ध्यान करना है। दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। यह नहीं कि जब ध्यान देना है — गैया हमारी भूखी है, हमें उसे चारा डालना है — और आप ध्यान करने बैठ गए। उल्टा हो गया न! जो काम करना है, सेवा का, तब ध्यान देना है; और जब स्वयं पर जाना है, तब ध्यान करना है। जब दूसरों के साथ जुड़कर कुछ करते हैं तो ध्यान देते हैं; जो अपने साथ अकेले जुड़कर करते हैं तो ध्यान करते हैं। दोनों ही तंत्र हैं, दोनों ही व्यवस्था है। तो अपनी व्यवस्था को हमेशा ध्यान रखना है।

आगे के चरण

तो आप सभी की आज मंत्र-दीक्षा पूर्ण हुई। अब जब आप इसको पूरा करेंगे — मंत्र-दीक्षा का जो जप है, वह सवा लाख जप है। फिर इसका दशांश, बारह हज़ार, वह अलग से किया जाता है — तब आपका मंत्र सिद्ध हो जाता है। फिर आप तंत्र-क्रिया-योग की दीक्षा के प्रथम चरण के लिए तैयारी करते हो।

अगर यह तैयारी — मंत्र-दीक्षा वाली — ठीक से हो गई, तो तंत्र-दीक्षा के प्रथम चरण में आपको प्रवेश होता है; अन्यथा पहले ही चरण में आप फेल हो जाते हो। तो पास होने के लिए सबसे ज़्यादा ध्यान आपको जो मंत्र-दीक्षा मिली है, उस पर देना है। जितना अच्छे से कर पाओगे, जितना अच्छा समर्पण आपका गुरु के प्रति होगा, जितना अच्छा आपका ध्यान होगा, जितनी अच्छी आपकी सोच होगी, जितनी आपकी क्षमता और योग्यता बढ़ेगी — वैसी ही तंत्र-क्रिया-योग के प्रथम चरण में आपकी परीक्षा होगी, जिसमें पास होते हो तो आगे चलते हो।

पाँच चरण तक मंत्र है। तंत्र-क्रिया-योग की दीक्षा में छठे चरण से मंत्र का काम ख़त्म — फिर आप स्वयं ही यंत्र, मंत्र, तंत्र सब ख़ुद ही बन जाते हैं, और सिर्फ़ ध्यान से काम चलता है।

अभी सोलहवें स्तर तक लोग पहुँचे हैं। आज शाम से सब सेवक बताएँगे और जो तंत्र-क्रिया-योग में लोग हैं उनका चयन होगा: जो पहले स्तर पर हैं दूसरे में जाएँगे, जो दूसरे वाले हैं तीसरे में जाएँगे — क्रम के अनुसार, अगर उनकी योग्यता और क्षमता ठीक है। बहुत लोग माँ-बाबा को अर्जी लगाकर आते हैं: “बाबा, हमें पास करा देना।” कभी-कभी तो ऐसा हुआ कि आधे लोग फेल हो जाते थे। तो दरबार आपको समझता है, कोशिश करता है कि आपकी शुद्धि हो जाए, ताकि आप अच्छे रहें।

अखाड़े के सचिव का उद्बोधन (जगतार मुनि जी)

गुरु पूर्णिमा पर रात्रि में दरबार

आज इस गुरु पूर्णिमा के महान पावन अवसर पर जो संस्कारों का समुद्र बह रहा है, गंगा बह रही है — यह हमारे सनातन की रीढ़ की हड्डी है।

सदियों से चली आई हमारी जो परंपरा है — यह देश ऋषि-मुनियों का देश है, यति-सतियों का देश है। यह भारतीय संस्कृति का गौरव है कि यह कर्मभूमि है, संस्कारभूमि है। जितने अवतार, पीर और पैगंबर आए, सब इसी भारतभूमि पर आए और अपना मार्गदर्शन देकर हमारे सनातन को बचाकर रखा। लेकिन कुछ विधर्मियों ने उस सनातन संस्कृति को आघात पहुँचाया।

लेकिन भारत ने पुनः ऐसे रत्न को जन्म दिया, जो सदियों से चली आ रही वैदिक सनातन परंपरा को पुनः जागृत करने का महान बेड़ा उठाकर सारे विश्व के कोने-कोने में इस सनातन की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज हम गौरव से कह सकते हैं कि हमारी भी एक ऐसी पीठ है जो सनातन की रीढ़ है — जहाँ से सनातन की परंपरा का जन्म और उदय होता है, जहाँ संस्कारों की शिक्षा मिलती है।

आज सबसे बड़े दुख की बात यह है कि जो भारतभूमि सदियों तक मनीषियों का देश थी, वह भारत संस्कारविहीन हो गया। आज कोई बड़े-बूढ़े-बुज़ुर्गों से, अपने माता-पिता से प्रेम से दो बातें करने के लिए तैयार नहीं है। इतना हम संस्कारों से गिर चुके हैं, इतना हमारा पतन हो चुका है कि आज सारी दुनिया में हमारी निंदा हो रही है।

हम सभी दृढ़ संकल्पित हों कि इस दरबार से एक अच्छी सोच लेकर अपने छोटे-छोटे गाँवों में जाकर इस दरबार के बारे में बताएँगे, और निश्चित ही अपने संस्कारों के बारे में, अपनी वैदिक परंपरा के बारे में, अपनी सनातन परंपरा के बारे में बताएँगे। निश्चित ही हमारा देश पुनः गौरव प्राप्त करेगा। किसी ज़माने में कहा जाता था कि भारत विश्वगुरु है — फिर से हमें विश्वगुरु बनाना है। इस दरबार में आकर आप दीक्षित हों और संस्कारों की इस धरोहर को आगे बढ़ाएँ।

एक ही बात मैं कहना चाहता हूँ: जिस देश में रहें, परदेश में रहें, जिस भी परिवेश में रहें — “राधा रमण” का जाप हमारी अंतरात्मा में चलता रहे। यही हमारे उद्धार का मूल सूत्र होगा। सब कुछ भूलो, लेकिन अपने परमात्मा को, अपने गुरु को मत भूलो।

मार्कंडेय पुराण में एक श्लोक आता है — कि यदि ऐसे महापुरुष से एक अक्षर का भी ज्ञान हो जाता है, तो पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य नहीं है जिसे देकर उनसे उऋण हुआ जा सके। तो निश्चित ही हमारे धर्म की ध्वजा सारी दुनिया में फहराएगी।

राजकन्या और ठग की कथा

गुरु का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। एक छोटी सी कहानी सुनाकर अपनी वाणी को विश्राम देता हूँ।

किसी राजा की एक कन्या थी। वह जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसको आत्मबोध हो गया, गुरु-कृपा हो गई, और वह हर समय ईश्वर से बात करने लगी। उसके माता-पिता ने सोचा कि शायद मेरी बच्ची पागल है या मंदबुद्धि है — यह तो पेड़-पत्तों से, लताओं से, पशु-पक्षियों से, हर वस्तु से बातें करती है। लेकिन जब यह “पागलपन” काफ़ी दिनों तक ठीक नहीं हुआ, तो राजा समझ गए कि हमारे घर में कोई ब्रह्मज्ञानी जन्म ले चुका है। राजा ने उसके रहने की अलग व्यवस्था बना दी, अलग महल बनवा दिया और कहा: “बेटी, इसी में रहकर तू भजन कर, उस परमात्मा का ध्यान कर।”

उसी शहर में एक चोर रहता था, जो अपना भेस बदलकर चोरियाँ करता था, ठगी मारता था, नकली दाढ़ी-बाल लगाकर लोगों को ठगा करता था। उसने जब यह ख़बर पाई कि राजा की कन्या बड़ी शीलवान है, गुणवान है, धनवान है और हर समय परमात्मा में लीन रहती है, उसके पास बहुत सारा धन है — तो सोचा, क्यों न इसको बरगलाकर ठग लिया जाए? वह ठगने गया।

कहा: “बेटी, सवेरे का पहर है, थोड़ी प्यास लगी है। क्या जल मिलेगा?” बिटिया ने कहा: “हाँ, ज़रूर महाराज, विराजमान होइए, जल मिलेगा।” जल ले आई। जल जैसे ही हाथ में पकड़ा — वह तो ठग था — कहने लगा: “तूने गुरु-दीक्षा ली है कि नहीं?” उसने कहा: “मैंने गुरु-दीक्षा नहीं ली, जीवन में अभी तक मैंने गुरु धारण नहीं किया।” कहने लगा: “फिर मैं पानी नहीं पीता। कहते हैं, निगुरे के हाथ का पानी भी नहीं पीना चाहिए।”

बेचारी राजा की कन्या बड़ी सोच में पड़ गई: बड़े दुख की बात है कि संत हमारे दरवाज़े से प्यासे चले जाएँगे। कहने लगी: “गुरु जी, इसका उपाय क्या है?” बोले: “तू मुझको गुरु मान ले, गुरु-दीक्षा ले ले, तब मैं यह जल पी लेता हूँ।” बिटिया ने कहा: “ठीक है महाराज, जैसी आपकी इच्छा। मैं तो गुरु की तलाश कर ही रही थी, और अच्छा हुआ, भगवान ने अवसर दिया, हमें गुरु मिल गए। निश्चित ही मैं आपसे दीक्षा लूँगी।”

कहने लगे: “बेटी, मंत्र की दीक्षा यहाँ नहीं होती, गुरुस्थान में होती है; घर और महलों में नहीं होती। इसके लिए जंगल और पहाड़ों में, ऐसे ऋषियों के पास जाना पड़ता है, तहाँ गुरु-दीक्षा होती है।” वह तो राजा की कन्या थी, सहर्ष तैयार हो गई: “चलो महाराज, हमको तो मंत्र लेना है — चाहे जंगल में दो, चाहे पहाड़ों में, चाहे नदी की कंदराओं में।”

वह ठग उसे एक जंगल में ले गया और कहने लगा: “बेटी, ये सारे सोने-चाँदी के आभूषण उतारकर रख दे, तब मैं तुझको मंत्र दूँगा। इन सांसारिक आभूषणों से दूर हो जा, इसके मोह-माया को त्याग दे।” उसने संत का वचन मानकर सारे आभूषण उतारकर रख दिए। फिर उसने कहा: “बेटी, हाथ ऊपर कर।” हाथ ऊपर करते ही उसे पेड़ से बाँध दिया और बोला: “बेटी, जब तक मैं नहीं आऊँगा, तब तक इसी बंधन में बँधी रहना। जब वापस आऊँगा, तब तेरा बंधन खोलूँगा और तुझे मंत्र दूँगा। उतने दिन तू मेरी प्रतीक्षा कर।” उसने कहा: “ठीक है, गुरुदेव।” उसने आँख बंद करके ऊपर हाथ किया — और वह ठग उस कन्या को लताओं से बाँधकर, सारा घर लेकर चला गया।

दो दिन, चार दिन हुए। जब राजकन्या नहीं आई, राजा को ख़बर हुई कि बेटी ग़ायब है। उसने अपने गुप्तचरों को भेजा। वे जंगल में ढूँढ़ने लगे, आख़िरकार उन्हें पता मिल गया। बोले: “बेटी, तेरी यह हालत किसने की?” बोली: “हमारे गुरु जी आए थे। गुरु-दीक्षा देने के लिए कह रहे थे और उन्होंने मुझे यहाँ रुकने के लिए कहा है।” — “अरे, तुझको बाँध गए हैं! यह रुकना नहीं है, ये तो बाँधकर चले गए हैं, तेरे प्राणांत हो जाएँगे!” वह राजकन्या कहने लगी: “चाहे मेरे प्राण क्यों न चले जाएँ, पर जब तक मेरे गुरु नहीं आते, तब तक मैं इस बंधन को नहीं खुलवाती। तुम वापस चले जाओ।”

गुप्तचर वापस गए, राजा से बताया: “महाराज, उसने एक टेक पकड़ रखी है कि जब तक मेरे गुरु नहीं आते, तब तक मैं इस बंधन से मुक्त नहीं हो सकती।” आख़िरकार राजा गया: “बेटी, हट छोड़ दे। वह संत नहीं था, वह ठग था, तेरे साथ छल हो गया है। तू वापस राजमहल चल, अपना भजन-भाव-भक्ति कर। और ऐसे ठगों से सावधान रहा कर — यह दुनिया है, कहीं तेरे को कोई ठग न ले।” उसने कहा: “कुछ भी हो, ठग हो या सही हो — गुरु अंधा, गुरु बावरा, गुरु के रहिए दास। जो गुरु भेजे नरक को, स्वर्ग की रखिए आस।

आख़िरकार मजबूर होकर पिता भी वापस चला गया। दो-चार-छह-दस दिन हो गए। वह बिना अन्न-जल ग्रहण किए उसी पेड़ से बँधी रही। आख़िरकार भगवान ने सोचा: यह तो राजकन्या है, इसका कोई दोष नहीं है, निश्चित इसके बंधनों को छोड़ना चाहिए।

आख़िरकार भगवान ने नारद जी से कहा: “नारद जी, जाओ, उस कन्या के बंधन छुड़वाकर आओ।” नारद जी आए, कहने लगे: “मुझे भगवान ने भेजा है, मैं तेरे बंधन खोलने के लिए आया हूँ।” राजकन्या कहने लगी: “नहीं। मैं तुमसे बंधन नहीं खुलवाऊँगी। वह तो मेरे जो गुरु जी हैं, वही आकर मेरे बंधन छोड़ेंगे। उनके सिवाय कोई नहीं…” — देखो उसकी निष्ठा! निष्ठा ही परमात्मा से मिला देती है। सेवक में भावना, श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए।

नारद जी को भी मना कर दिया। जब भगवान विष्णु स्वयं उस कन्या का कष्ट सहन नहीं कर पाए, तो स्वयं गरुड़ पर बैठकर उसके पास आए। चतुर्भुज रूप धारण करके कहने लगे: “मैं स्वयं साक्षात नारायण हूँ और तुझे दर्शन देने आया हूँ।” वह कहने लगी: “नारायण हो चाहे जो कुछ भी हो — जब तक मेरे गुरु जी नहीं आते, जब तक इस बंधन से मेरे गुरु जी मुझे मुक्त नहीं करते, तब तक मैं यह बंधन नहीं खुलवाऊँगी। मेरे गुरु जी ही नारायण का पता बतलाएँगे।” उन्होंने कहा: “मैं नारायण से मिलवा दूँगा, गुरु के द्वारा तेरी संसार-सागर से मुक्ति करवा दूँगा।”

आख़िर नारायण ने कहा: “नारद जी, जाओ, उस नक़ली चोर को कहीं से पकड़कर ले आओ। वह तो इस राजकन्या को ठगकर चला गया है।” नारद जी गए। एक गाँव में वह अपने मुख में कालिख लगा रहा था, अपना वेश बदल रहा था। नारद जी पकड़कर ले आए: “इस कन्या को पहले बंधन से मुक्त कर।” तब आख़िरकार उस ठग ने उस कन्या को बंधन से मुक्त किया। और राजकन्या गुरु के चरणों में गिरकर कहने लगी: “महाराज, आपके कारण, आपकी कृपा के कारण — चाहे कुछ भी हुआ हो — आपकी कृपा से मुझे परमात्मा के दर्शन हो गए।”

यह भावना, श्रद्धा और विश्वास का एक जीता-जागता उदाहरण है। इसलिए आप लोग भी अपने मन के अंदर दृढ़ संकल्प करिए कि नहीं, मुझे दरबार से जुड़ना है और जुड़े रहना है, और अपने जीवन को स्वस्थ और निरोग बनाना है।

साथियो, यह कोई नई परंपरा नहीं है जो महाराज जी ने चलाई — यह हमारे वेद का विज्ञान है, हमारी बहुत पौराणिक व्यवस्था है। “मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा, पंचम भजन सो बेद प्रकासा।” वेदों में कहा है कि मंत्र का जाप करने से भी परमात्मा की प्राप्ति और मन की शुद्धि हो जाती है। इसलिए गुरु पर विश्वास होना चाहिए, गुरु के प्रति आदर होना चाहिए, गुरु के प्रति सम्मान होना चाहिए।

इस गुरु-पर्व पर मैं ज़्यादा कुछ न कहता हुआ, देश-विदेश के कोने-कोने से आए हुए आप सभी का हार्दिक अभिनंदन और स्वागत करता हूँ। सबको धन्यवाद करता हूँ, सबको नमन और वंदन करता हूँ। हरि ओम शांति, हरि ओम शांति।

सचिव की कथा पर गुरुदेव के वचन

बहुत सुंदर वाणी में हमारे सचिव साहब ने, उदाहरण के रूप में कहानी सुनाते हुए जो दृष्टांत दिया — बहुत ही सुंदर है, मनन करने योग्य है।

इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ: गुरु चाहे जैसा हो, अगर शिष्य का विश्वास मज़बूत है, तो वह विश्वास ही उसको पूर्णता तक ले जाता है। बिना शंका किए गुरु के प्रति जो समर्पण है, वह समर्पण ही उसको पूर्णता तक पहुँचाता है। इस बात को हमेशा ध्यान रखो। बिना समर्पण के कुछ होता नहीं। समर्पण हुआ — आप पार हुए।

पानी पर चलने की कथा

एक गुरु जी थे। उनके पास एक सज्जन गए, उन्होंने कहा: “हमको पानी के ऊपर चलना है।” गुरु जी ने कहा: “पानी के ऊपर चलना है?” — “हाँ, आप दीक्षा दो।” उन्होंने दीक्षा दे दी, मंत्र दे दिया, और वह जाकर मंत्र जाप करने लगा। जिन्होंने दीक्षा दी थी, वह तो ख़ुद कभी पानी पर चले नहीं थे। गुरु जी कहने लगे: “पागल है। चलो, जान छूटी।” किसी तरह वह गया।

एक दिन लोगों ने गुरु जी को बताया कि तुम्हारा जो चेला है, वह पानी के ऊपर चलते-चलते नदी पार कर रहा है। “यह कैसे हो गया?” गए, पूछा: “कैसे?” उसने कहा: “गुरुदेव, मंत्र सिद्ध हो गया, आपने ही तो दिया था।” और गुरुदेव ने तो ऐसा ही मंत्र दे दिया था, अलल-टप्पू, जान छुड़ाने के लिए। उसका विश्वास जीत गया।

गुरु ने कहा: “चलकर दिखाओ।” उसने पानी के ऊपर चलकर दिखा दिया। तो गुरु ने सोचा: जब यह चेला चल सकता है, और मंत्र तो मैंने ही दिया था — लाओ, हम भी चलकर देखते हैं। तो गुरु जी जैसे ही नाव से उतरे, बीच धार में पानी में गोता खाने लगे, डुबकियाँ खाने लगे।

तो दरबार यही कहता है कि शिष्य के अंदर गुरु के प्रति जो समर्पण और विश्वास बना हुआ है, वही उसको पूर्णता की ओर ले जाता है, वही उसको पूरा करता है। शंका नहीं — जो बताया गया, उसका पालन करना है। ऐसा महापुरुषों ने दृष्टांतों के द्वारा तमाम बार लोगों को बताने की कोशिश की कि अपने विश्वास को मज़बूत रखो। गुरु पर शंका करके आप अपने पर शंका करते हो।

मुखिया महंत जी का आशीर्वचन (श्री भगत राम जी)

आप सभी, जो गुरु पूर्णिमा के उपलक्ष्य में इस करौली धाम पर पहुँचे हो — सभी को बहुत-बहुत आशीर्वाद, बहुत-बहुत बधाई।

गुरु-पुण्य का माहात्म्य और गुरु-दक्षिणा साल में एक बार आती है। उसमें आपको गुरु-दक्षिणा और वैदिक परंपरा के अनुसार हवन-क्रिया द्वारा आपकी शुद्धि करके, आपको इस स्थान के साथ, गुरु जी के साथ जोड़कर, आपके पूर्व जन्मों के जो पाप-कर्म हैं उनकी शुद्धि करके आपको दीक्षा दे रहे हैं। आपको सन्मार्ग पर चलाने का प्रयास और यत्न कर रहे हैं। आप बहुत ही भाग्यशाली हो — और महामंडलेश्वर जी, जो यह कार्य कर रहे हैं, उनका भी बहुत धन्यवाद।

आप संतों का संग कर रहे हो, संतों के दर्शन कर रहे हो, संतों के मार्ग पर चल रहे हो। हमारे अनेक ग्रंथों, शास्त्रों और वेदों में लिखा है कि जहाँ संत-महापुरुष बैठते हैं, वहाँ अड़सठ तीर्थों के स्नान का माहात्म्य हो जाता है। गुरु ग्रंथ साहिब में एक तुक आती है — जहाँ साधुओं के चरण पड़ते हैं वहाँ अड़सठ तीर्थों का फल हो जाता है, और जहाँ भगवान के नाम का उच्चारण होता है, वहाँ बैकुंठ हो जाता है। आप लोग इस बैकुंठ में बैठे हुए हो। आप बहुत ही भाग्यशाली हो। आपके पूर्व जन्म के, आपके माता-पिता की तपस्या की हुई है — इसलिए आप संतों के दर्शन कर रहे हो, इसलिए आप संतों के मार्ग पर चल रहे हो।

संत का संग, संत की सेवा, संत का नाम — ये विरले व्यक्ति होते हैं जो इसको प्राप्त करते हैं। हर एक आदमी का यह भाग्य और उसका प्रयास नहीं होता कि वह पूर्ण संत का संग करे, या संत के पास जाकर सेवा करे, या गुरु-दक्षिणा ले। जिन्होंने पूर्व कर्मों में पुण्य किए, जिनके माता-पिता ने पुण्य किए — उनके घर में ऐसी संतान होती है जो माता-पिता की आज्ञा में रहती है, संस्कारों में रहती है, गुरुओं की सेवा में रहती है, और गुरुओं से दीक्षा लेकर बैकुंठ के रास्ते पर चलती है।

गुरु के बग़ैर अंधेरा है। एक तुक आती है — सौ चंद्रमा उग आएँ और हज़ार सूरज चढ़ जाएँ, इतने प्रकाश के होते हुए भी गुरु के बिना घोर अंधकार है। गुरु के बग़ैर अंधेरा ही अंधेरा है। “गु” का मतलब अंधेरा और “रु” का मतलब प्रकाश — इस अंधेरे से बाहर ले आने वाला गुरु होता है। गुरु शब्द से, सेवा से, वैदिक परंपरा से, हवन-यज्ञ से उसके पापों का नाश करके उसको उजाले में ले आता है।

तो आप बहुत भाग्यशाली हो, जो आकर यहाँ श्रद्धा, भावना और विश्वास से सेवा कर रहे हो। अनेक फ़रमान हैं। जिन महापुरुषों ने श्रद्धा से भगवान को पाया — नामदेव जी ने बहत्तर बार भगवान के दर्शन किए। और भक्त धन्ना, जिसको एक ब्राह्मण ने लालच में आकर शालिग्राम का टूटा हुआ खंड देकर कहा कि इसकी आराधना कर, इसकी सेवा कर, स्नान करवाया कर और इसको भोजन करवाया कर, यह तुझे दर्शन देंगे — उसने अपनी श्रद्धा से, हठ करके बैठ गया; कई दिन बाद जब भगवान आए, तो उसको दर्शन दिए। श्रद्धा से, भाव से, हठ से, तप से भगवान दर्शन देते हैं।

महामंडलेश्वर स्वामी महाराज करौली शंकर शंकर दास जी महाराज को मैं मस्तक टेकता हूँ और इनका धन्यवाद करता हूँ। सारी संगत का धन्यवाद करता हूँ। ओम शांति शांति शांति।

शिव-शक्ति दरबार में संत और अतिथि

ध्यान की ओर, और पत्रिका का विमोचन

हमारे मुखिया महंत जी ने भी आपको आशीर्वाद-स्वरूप जो आशीर्वचन कहे, मार्गदर्शन दिया, उसके लिए हम लोग आभारी हैं।

इसके बाद अंदर शिव-शक्ति दरबार में मंत्र-दीक्षा होगी। आप लोगों की शुद्धि-सिद्धि इस मामले में हो गई है कि आप तमाम बाहरी चीज़ों से टूट गए हैं और अपनी गुरु-परंपरा से जुड़ गए हैं — ताकि बाहर की गंदगी आपको छुए नहीं, कष्ट न दे, नष्ट न करे। अब आप मंत्र-दीक्षा के योग्य हुए हैं।

दरबार की एक पत्रिका है, उसका विमोचन होना है — मासिक पत्रिका प्राइम टाइम्स; और एक पुस्तिका है ज्ञान सत्ता। यह आपको दरबार की हर प्रकार की सूचनाएँ देगी और सभी संतों तक पहुँचेगी। इस पत्रिका के माध्यम से आपको समय-समय पर दरबार की बहुत सूचनाएँ मिलती रहेंगी — इसमें तमाम टेस्टिमोनियल भी होंगे, कि जो लोग अपनी घटना बताना चाहेंगे कि दरबार में आकर उनके जीवन में क्या परिवर्तन हुआ।

पाठ के बारे में: यह पाठ प्रवचन की रिकॉर्डिंग पर आधारित है और लोगों को संबोधित अंश ही यहाँ दिए गए हैं — आरंभिक स्वागत, मुख्य प्रवचन, दोनों दृष्टांत, सचिव तथा मुखिया महंत के वचन, और दीक्षा से जुड़े व्याख्यात्मक निर्देश। भजन, संगत का कीर्तन, जपे गए मंत्र और कर्मकांड की क्रियाएँ (अर्घ्य, निर्देशित ध्यान आदि) यहाँ नहीं दी गई हैं। बोली गई भाषा को केवल पढ़ने योग्य बनाने के लिए संवारा गया है।

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