मई 2027 — महामंडलेश्वर करौली शंकर महादेव महाराज की पहली आधिकारिक यूरोप यात्रा।गुरुदेव की यात्रारुचि दर्ज करें
प्रवचन - गुरुदेव·

गुरुदेव के प्रवचन
हम अपनी गलतियों से क्यों नहीं सीख सकते

सत्र का आरंभ

गुरुदेव: आप सभी का बहुत बहुत स्वागत है। आज के इस प्रातःकालीन सत्र में हम ध्यान साधना का, संगीत के साथ, एक प्रयोग करेंगे, और उसके पश्चात उसके अनुभव पर चर्चा करेंगे। कोई भावना आती है, कोई समस्या आती है, तो उस पर चर्चा करेंगे।

गलती से सीखा नहीं जा सकता

गुरुदेव: सभी मनुष्य, समस्त मनुष्य जाति, शुभ की चाहना तो रखती है, लेकिन शुभ कर पाने में असफल हो जाती है। करना अच्छा चाहते हैं, अच्छा हो नहीं पा रहा है। इसका मनुष्य जाति को दुख भी है और पीड़ा भी।

जो भी गलतियाँ करते हैं, तो बताया जाता है कि 'ठीक है, गलती की है तो सुधारो, गलती से कुछ सीखो'। पूरा परसेप्शन ही गलत है। गलती से कुछ भी नहीं सीखा जा सकता। जो गलत है, उससे सीखा नहीं जा सकता। मूर्ख से आप क्या सीख सकते हैं? सीखा उससे जा सकता है जिसने समझा हो, जाना हो, अनुभव किया हो। जिसने अनुभव किया है, उससे आप सीख सकते हैं। जिसने अनुभव नहीं किया, उसके पास केवल सूचना है। इसीलिए महापुरुषों ने सूचना और अनुभव के भेद को बहुत स्पष्ट किया है।

इस भेद को जब आप समझ लेते हैं, तो समझने की प्रक्रिया आसान हो जाती है। एक किताब पढ़कर समझना है, दूसरा स्वयं को पढ़कर, अनुभव को समझकर समझना है। दोनों में फर्क है।

जीवित गुरु का महत्व

गुरुदेव: और स्वयं को समझना और भी आसान हो जाता है जब आप किसी समझे हुए व्यक्ति के संयोग में रहते हैं। उनके साथ रहने से आपका जीना सरल हो जाता है, क्योंकि आपके अंदर एक आश्वस्ति आती है कि 'यदि यह व्यक्ति समझ सकता है, तो हम भी समझ सकते हैं'। आपके पास एक जीता-जागता उदाहरण है।

इसीलिए लोग अक्सर जीवित गुरु की तलाश करते हैं। जीवित गुरु का इतना ही उपकार है कि आपके अंदर आश्वस्ति आती है कि 'यदि यह ऐसा कर सकता है, तो हम भी कर सकते हैं'। उसके आचरण से आप प्रेरित होते हैं। इसी एक मायने में गुरु का जीवित प्रमाण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। (आगे का छोटा अंश ध्वनि-प्रतिलेख में बहुत अस्पष्ट है।) और आपके अंदर यह आश्वस्ति बनती है।

ध्यान से क्या होता है

गुरुदेव: जैसा मैंने शुरू में कहा — ध्यान साधना करके व्यक्ति के तमाम संशय और असफलता की नकारात्मक स्मृति नष्ट होने लगती है। आत्मविश्वास बढ़ता है, जीने की इच्छा बढ़ती है, इच्छाशक्ति बढ़ती है, और आप समझने के लिए तैयार हो जाते हैं।

भ्रमित कौन करता है — भ्रम और द्वैत

गुरुदेव: आप शुभ करना चाहते हैं, कर नहीं पा रहे हैं। बीच में कमी कहाँ रह जाती है? ऐसा कैसे होता है कि हम पूर्व की ओर जाना चाहते हैं और पश्चिम पहुँच जाते हैं? आखिर ऐसा क्या है? कौन सी शक्ति है जो हमें भ्रमित कर देती है?

जिस दिन आपने इस सूत्र को पकड़ लिया, जिस दिन भ्रम आप पर सवार होने के बजाय आप भ्रम के ऊपर सवार हो गए, उस दिन आपका रास्ता क्लियर हो जाएगा। अभी भ्रमित करने वाला भी और भ्रमित होने वाला भी — दोनों मैं ही हूँ। तो इस सूत्र को पकड़कर चलना है।

आपका मन, आपकी वृत्ति, आपका चित्त, आपकी बुद्धि — ये भ्रमित होते रहते हैं और भ्रमित करते रहते हैं। स्वयं को द्वैत में फँसाए रखते हैं। इसलिए बहुत ध्यान रखना है — कहीं बाहर से आप भ्रमित नहीं हो रहे। और यह भी ध्यान रखना कि आपका काम बाहर से आकर कोई दूर नहीं करेगा। आपको स्वयं को भ्रमित होने से बचाना होगा।

और यह शक्ति आप सबके पास है। आप स्वयं को भ्रम से मुक्त कर सकते हैं और दूसरों को भी भ्रमित होने से बचा सकते हैं। यह शक्ति सभी के पास है। भ्रमित व्यक्ति भ्रमित ही करेगा, भ्रमित स्मृतियाँ भ्रमित ही करेंगी। समझदार व्यक्ति में समझदारी रहेगी। नेचुरली, जिसके पास जो है वही वह देगा।

समझदारी, क्रोध और प्रमाण

गुरुदेव: मूर्ख से समझदारी की आशा करना व्यर्थ है। और समझदार व्यक्ति के क्रोधित होने की संभावना बिल्कुल नहीं है। यदि क्रोध हो रहा है, तो इसका अर्थ है वह समझदार नहीं है। प्रमाण से समझिए — प्रमाण क्या मिल रहा है? हम प्रमाण से ही समझते हैं कि अच्छा है या खराब।

इसलिए सबसे सुंदर बात यह है: संसार में कोई भी घटना हो — सोना, जागना, उठना, खाना, पीना, एक-दूसरे से मिलना, व्यवहार, व्यापार, नौकरी, राजनीति, किसी प्रकार की समाज सेवा — कुछ भी हो, आपके अंदर जो है वही आप हर जगह फैलाओगे। सामने वाले में जो है, वह वही फैलाएगा।

रास्ता स्वयं चलना है

गुरुदेव: इसलिए किसी भी भ्रमित व्यक्ति से यह आशा मत करिए कि वह आपको सही रास्ता दिखा पाएगा। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना है। रास्ते को इंगित किया जा सकता है — 'इधर चले जाओ'। पर कोई आपको रास्ता चलाकर वहाँ पहुँचा नहीं सकता। स्वयं चलना है।

ये सारी क्रियाएँ इसी तरह होती हैं। ध्यान जितना गहन होगा, उतने गहरे में आप चीजों को समझते जाएंगे और सब स्पष्ट होता जाएगा। आपको पता ही नहीं लगेगा कि आपके आचरण में कमी क्या रह गई थी। इसलिए पूरा ध्यान अपने ऊपर ही रखना है। सामने वाला कहाँ पहुँचा, सामने वाला कहाँ है… (वाक्य रिकॉर्डिंग में अधूरा है और आगे जारी रहता है।)

दरबार की रक्षा

गुरुदेव: इस बात का विशेष ध्यान रखें। दरबार की यह शक्ति आपको घने धोखों से भी बचा लेती है। अन्यथा परंपरा तो यही है कि जो कुछ करना है सब आपको ही करना है, आपको बचाने का कोई और उपाय नहीं। दरबार आपको तमाम चीजों से बचाता है, सुरक्षित करता है — शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक कष्टों से, तथा आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक समस्याओं से। और आपको सही रास्ता दिखाता है। लेकिन चलना आपको ही है।

दिन की व्यवस्था

गुरुदेव: तो अभी हम इस ध्यान को आगे बढ़ाएँगे। पूरा ध्यान संगीत पर होगा। फिर अगले सत्र में हम साथ बैठेंगे। भोजन के बाद थोड़ा विश्राम करके चार बजे से फिर बैठेंगे — चार से, या साढ़े चार से, सात बजे तक एक सत्र करेंगे। कम से कम दो सत्र हो जाएँगे। समय बचा तो कुछ चर्चा और बीच में ब्रेक कर लेंगे। और यदि समय रहा तो डिनर के बाद भी एक घंटे का सत्र करेंगे। तो अभी का सत्र लंच तक पूरा करते हैं। शुरू करते हैं। ओम। प्लीज़।

ध्यान का निर्देश — आ, उ, म

गुरुदेव: मंत्र आएंगे। और ध्यान रखें कि इस बार यह संगीत की साधना है — हम संगीत के माध्यम से साधना के लिए पहुँचे हैं। इसके लिए आ – उ – म का प्रयोग करेंगे। तीन बार नाभि पर, तीन बार हृदय पर, और तीन बार मस्तिष्क पर। और इसी तरह जब वापस लौटेंगे — तीन बार मस्तिष्क पर, तीन बार हृदय पर, तीन बार नाभि पर। आ – उ – म। हर स्थान पर जो पहले से डाला है, उसी को करेंगे। जब यह कर लेंगे तो रुकेंगे, और वहाँ से ध्यान को संगीत पर आगे ले जाएंगे। ये बातें बीच-बीच में मैं आपको बोलता रहूँगा। तो सभी लोग इसे ठीक से सुनेंगे, प्लीज़, स्मरण रखें।

इसके बाद संगीत के साथ ध्यान होता है; उसका प्रतिलेख केवल साधना के दौरान के निर्देश हैं और यहाँ छोड़ दिया गया है।

सत्र का समापन

गुरुदेव: अब लंच का समय है। लंच करके आप आपस में चर्चा कर सकते हैं, बैठकर आराम कर सकते हैं। चार बजे हम सब यहाँ वापस आएंगे और अपने कार्य को आगे बढ़ाएँगे। आपका ध्यान बहुत सुंदर रहा — इसके लिए आप सबको बधाई। आप ऐसे ही ध्यान करते रहें, बढ़ते रहें। हरि ओम।

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