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प्रवचन - गुरुदेव·

गुरुदेव के प्रवचन
शक्ति की सामर्थ्य, ध्यान का रहस्य और प्राचीन भारत का विज्ञान

विजयादशमी के दिन भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के शिष्यों के साथ गुरुदेव के ऑनलाइन संवाद का संपादित प्रतिलेख। प्रवचन की विषय-वस्तु अपरिवर्तित है; छोटी पंक्तियों को अनुच्छेदों में जोड़ा गया है और उपशीर्षक जोड़े गए हैं। केवल बातचीत के दौरान की तकनीकी टिप्पणियाँ और शब्दशः दोहराव छोड़े गए हैं। अस्पष्ट अंश वर्गाकार कोष्ठकों में चिह्नित हैं। अंत में आध्यात्मिक और संस्कृत शब्दावली दी गई है।

विजयादशमी के दिन अनुष्ठान

खूब खुश रहिए, प्रसन्न रहिए आप लोग, स्वस्थ रहिए। कैसे हो आप लोग? हरि हर, सभी को नमस्कार। नमस्कार, खुश रहिए। पुरुषोत्तम जी, खूब खुश रहिए। सरिता, खुश रहो बेटा। आप सभी लोग खूब खुश रहिए, प्रसन्न रहिए, स्वस्थ रहिए, आनंदित रहिए।

और बहुत सुंदर रहा जो आज आपने एक अनुष्ठान किया, श्रीविद्या अनुष्ठान, यहाँ से माँ का अनुष्ठान किया आप लोगों ने, और विजयदशमी के दिन किया। बहुत अद्भुत शक्ति की साधना के साथ, शक्ति की उपासना के साथ, शक्ति अनुष्ठान किया, ये बहुत अच्छी बात है।

आप सभी को सबसे पहले नवरात्र पर्व की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, और भारतवर्ष में आज के दिन विजयदशमी का जो पर्व मनाया जा रहा है, उसके लिए आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आप सभी को शुभ हो, आप सभी के परिवार का कल्याण हो, आप सभी लोग स्वस्थ रहें और हमेशा अच्छे रहें।

बल और शक्ति

जो दो चीजें हैं, प्रथम एक अवस्था है बल की और दूसरी जो अवस्था है, वो है शक्ति। यानी एक फोर्स है और दूसरा पावर है। फोर्स में और पावर में दोनों में अंतर है।

एक चीज वो है जो स्थिर है, एक जगह, वो बल है। और दूसरा वो है जो डायनेमिक है, जो चलायमान है, जो सृजन-विध्वंस में लगा है, वो शक्ति है। सृजन और विध्वंस के बीच की जो कड़ी है, जिसके कारण सृजन होता है, जिसके कारण विध्वंस होता है, वो बल है, और दोनों ही आवश्यक हैं। एक शव है और दूसरा शक्ति है। शव मतलब बल है।

जैसे हमारे अंग-प्रत्यंग हैं, सब अपनी-अपनी जगह स्थिर हैं। हार्ट अपनी जगह पर है, लीवर अपनी जगह पर है, किडनी अपनी जगह पर है, आँखें अपनी जगह पर हैं। तो सब चीजें अपनी-अपनी जगह जो सेट हैं, इस सेट होने के पीछे जो वस्तु है, उसका नाम है बल।

तो धरती और सूरज के बीच में जो दूरी दिख रही है, ये बल है। सूरज के चारों ओर जो दिख रहा है, बल है। धरती के चारों ओर जो दिख रहा है, बल है। हर चाँद, सितारे, हर वस्तु के आसपास परिधि के बाहर जो दिख रहा है, वो बल है। यानी जब किसी भी वस्तु की परिधि बनती है, वो इस बल के कारण ही बनती है।

जिसकी परिधि नहीं है

और बल की कोई परिधि नहीं है, अद्भुत है। बल की कोई परिधि होती नहीं, परिधि हमेशा किसी वस्तु की होती है। और वस्तु की जो परिधि होती है, वो बल के कारण होती है। जब परिधि टूट जाती है तो वह वस्तु बल में विलीन हो जाती है। उसकी परिधि गायब हो जाती है। तो ऐसे हर वस्तु की परिधि है।

जिसकी परिधि है, उसको दो आँखों से देखा जा सकता है, इन दो आँखों से। और जिसकी परिधि नहीं है, उसको कैसे देखेंगे? जो दृष्टिगोचर है, दो आँखों से देखने वाली वस्तु, वो परिधि में होती है, वही दिखती है। उसकी परिधि बनती है, जिसे आप कागज़ पर बना सकते हैं। जो कागज़ पर बना सकते हैं, वो दो आँखों से दिखती है। और जिसको कागज़ पर नहीं बना सकते, वो दृष्टिगोचर नहीं है, वो ज्ञानगोचर है।

तो जो हवन इत्यादि आप करते हैं, अनुष्ठान इत्यादि करते हैं, वो दृष्टिगोचर से ज्ञानगोचर तक पहुँचने की विधि है। शक्ति से बल तक पहुँचते हैं। तो शक्ति की आराधना इसीलिए आवश्यक है, ताकि हम बल तक पहुँच सकें, बल को समझ सकें, क्योंकि बल ही ज्ञान है।

बल ही सर्वत्र फैला हुआ है। जो बल है, वो व्यापक है, चारों ओर व्याप्त है, जिसकी परिधि नापी न जा सके। सूरज के चारों ओर स्पेस, धरती के चारों ओर स्पेस, हर इकाई के सामने स्पेस, ब्रह्मांड के चारों ओर स्पेस। तो ऐसा जो स्पेस चारों ओर है, पूरा आकाश, उसका कोई चित्र नहीं है। तो जिसका चित्र नहीं है, जो व्यापक है, वो वस्तु में पूरा का पूरा समा नहीं सकता। और अगर वस्तु में पूरा का पूरा समा गया है, तो फिर वो व्यापक नहीं है। दोनों बातें।

ईश्वर जन्म नहीं लेता

जो कहा जाता है न कि भगवान जन्म लेते हैं, ईश्वर जन्म लेता है — ईश्वर कभी जन्म नहीं लेता। ईश्वर कभी जन्म लेता नहीं। ईश्वर अंश जीव अविनाशी। अंश के रूप में चीजें इस पूरे जगत में बिखरी हुई हैं।

शरीर को कौन चला रहा है

आप लोगों को शायद ये बात पता हो कि नहीं, एक ही शरीर में कई-कई कारण शरीर रहते हैं। कारण का मतलब चित्त, और उस चित्त के साथ सोच जुड़ी हुई है। ये जो स्थिति है, प्रत्येक शरीर की है, बहुत संघर्ष है। अगर आपने शक्ति की आराधना नहीं की है, तो इनसे बचाने वाला फिर कोई नहीं है। फिर किसका शरीर है और कौन चला रहा है, खुद को पता नहीं होता।

जो सक्षम गुरु होता है, जो पूर्ण गुरु होता है, उसी के समक्ष आपको पता चलता है कि ये शरीर मेरा है और मैं चला रहा हूँ, या ये शरीर मेरा है और कोई और चला रहा है। जब हम जैसा चाहते हैं वैसा कर नहीं पाते, वैसा हो नहीं पाता, और ऐसा बार-बार होता है, मतलब कोई और कमांड दे रहा है।

तो प्रत्येक व्यक्ति की अवस्था शक्ति के अनुसार व्यक्त होती है। अगर शक्ति सक्षम है, साथ में है, तो जिसका शरीर है, फिर वही शरीर चला रहा होता है, स्टीयरिंग उसी के हाथ में होता है। ये बहुत अद्भुत है।

मैं रोज़ तमाम ऐसी चीजें देखता हूँ जो शास्त्रों में नहीं हैं, पुस्तकों में नहीं हैं, ग्रंथों में नहीं हैं। जो महापुरुषों ने लिखा है, अनुभव कुछ और कहता है। एक व्यक्ति बहुत अच्छा होता है, अचानक उसमें कोई दुष्ट कारण शरीर प्रविष्ट होता है और उसकी प्रवृत्ति बदल जाती है। प्रवृत्ति मतलब उसका सूक्ष्म बदल जाता है। क्योंकि जो चीज शरीर को गवर्न करेगी, वो सूक्ष्म है।

कारण शरीर कभी स्थूल को सीधे गवर्न नहीं करता। उसका मैनेजर है उसका सूक्ष्म शरीर, उसके थ्रू वो बॉडी को गवर्न करता है। तो किसी की बॉडी में कोई जाकर गवर्न करने लगता है, कब्ज़ा बना लेता है।

चक्रों में बढ़ती शक्ति

लेकिन अगर शक्ति की सामर्थ्य होती है, अगर आपकी शक्ति ठीक है, आप शक्ति के उपासक हैं, शक्ति अगर आपके साथ है, तो कोई दूसरा जीव आपके शरीर में ट्रैवल नहीं कर सकता। फिर आप ही होते हो। और अपनी ध्यान साधना सिर्फ आपकी ही होती है, और ध्यान साधना के पुण्य भी आपके ही पास होते हैं, वो आपके ही साथ रहते हैं। और आपकी जो कुंडलिनी शक्ति है, वो उत्तरोत्तर बढ़ती रहती है, शक्ति एकत्रित होती रहती है।

हर चक्र में एक नई शक्ति का उदय होता है। हर दो चक्रों के घर्षण से सूक्ष्म में एक नई शक्ति उत्पन्न होती है। जब स्थूल में चक्रों का घर्षण होता है, तो स्थूल शक्ति, स्थूल शरीर पैदा होते हैं। और जब स्वयं के ही चक्र अपने अगले चक्र से जुड़ते हैं, घर्षण करते हैं, तो सूक्ष्म में एक नई शक्ति पैदा होती है, जो आपकी आज्ञा के अनुसार, आपके अनुसार चलती है।

तो किसी भी प्रकार के किए गए यज्ञ, व्रत, अनुष्ठान आपकी जो आंतरिक शक्ति है, जो आपकी आत्मिक शक्ति है, उसको बढ़ाते हैं। आपकी जो इच्छा शक्ति है, उसको मजबूत करते हैं और आपके ध्यान साधना के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। इसलिए समय-समय पर यज्ञ, अनुष्ठान इत्यादि आवश्यक हैं। साधक के लिए भी बहुत आवश्यक हैं।

दक्षिण में बची हुई परंपरा

कालांतर में भारत में भी... अब आप लोग तो वहाँ बैठे हैं, यूएस में हैं, हम तो भारत की बात कर रहे हैं। यहाँ साउथ को थोड़ा सा छोड़ के, और इधर उत्तर वगैरह में थोड़े कुछ स्थानों को छोड़ के, बाकी तो ये सब एकदम खराब कर लिया है। यज्ञ इत्यादि को नहीं मानते, कहते हैं ये सब बकवास है।

जबकि साउथ वगैरह में अभी भी इन सब हवन इत्यादि को बहुत मजबूती से पकड़ के रखा हुआ है, बहुत सुंदर तरीके से, अभी भी। जब साउथ जाते हैं तो बड़ी खुशी होती है देख के कि उधर अभी भी अपनी जो वैदिक परंपरा है, उसको उन्होंने बहुत ज़बरदस्त तरीके से मजबूती से पकड़ा हुआ है। और इसीलिए वो आगे हैं। इसीलिए उनका सोच-विचार, उनका सोचने का तरीका, उनका कार्य करने का तरीका, उनका जीने का तरीका नॉर्थ से बिल्कुल अलग है, लापरवाही वाला नहीं है। तो ईश्वर भी उसी प्रकार से मदद करता है।

तो बहुत अच्छा है कि आप लोगों ने अनुष्ठान किया। और आज के अनुष्ठान की ये ऊर्जा आप सब के पास है। अभी आप सब उसको फील करेंगे कि इस अनुष्ठान की ऊर्जा आपके पास है। तो अभी आपको फीलिंग भी होगी कि अच्छा है, हल्का लग रहा है, अच्छा लग रहा है, पॉजिटिव लग रहा है, आलस नहीं है। लगेगा, यार, अच्छा लगा, बहुत अच्छा लगा।

अच्छा लगना और अच्छा होना

तो बहुत अच्छा लगा, मतलब जो अच्छा किया गया, तो अच्छा लगा। तो अच्छा लगने से अच्छा होने तक की यात्रा है। अच्छा करना और अच्छा होना दो अलग-अलग विषय हैं। अच्छा लगना और अच्छा होना दो अलग-अलग वस्तुएँ हैं। तो अच्छा करके फिर अच्छा लगता है, लेकिन अच्छा हो भी जाए, है ना, इसके लिए क्या करना है? अच्छा होने के लिए ध्यान साधना।

जब दरबार कहता है कि मन की शुद्धि भजन से हो जाती है — जब भजन करो, तो भजन से मन की शुद्धि होती है। और जब सेवा करते हैं, गौ सेवा करते हैं, मानव सेवा करते हैं, गरीबों की सेवा करते हैं, जो पात्र हैं उनकी हम मदद करते हैं, गुरुजनों की सेवा करते हैं, माता-पिता की सेवा करते हैं — ऐसी सेवा करने से बुद्धि की शुद्धि होती है, बुद्धि शुद्ध होती है।

तो मन की शुद्धि हुई भजन से, बुद्धि की शुद्धि हुई सेवा से, और चित्त की शुद्धि होती है ध्यान साधना से। तो ध्यान साधना अल्टिमेट है, उससे चित्त की शुद्धि होती है।

चित्त की शुद्धि का अर्थ

चित्त की शुद्धि का अर्थ क्या हुआ? आपके चित्त में जो अनावश्यक एनर्जी है, जिन्होंने कब्ज़ा जमा रखा है, आपको पता भी नहीं उसका। कब्ज़ा जमा हुआ है। वो चित्त की शुद्धि ध्यान साधना से होती है।

जैसे देखा होगा, जानवरों में कीड़ा होता है ना, किलनी बोलते हैं उसको। दाँत गड़ा के चिपक जाती है, फिर लोग उसको चिमटी से पकड़ के निकालते हैं, तो थोड़ा सा खून के साथ निकलती है। ऐसे ही दूसरे जीव के पूरा घुसने का तो जुगाड़ है नहीं, लेकिन जो कारण हैं, वो अपना कारण शरीर लेकर घुस जाते हैं। तो वो सब धीरे-धीरे बाहर जाते हैं, चित्त की शुद्धि होती है।

दूसरों के कर्म भोग अपने शरीर पर भोगने पड़ते हैं। जो दूसरे लोग, उनकी एनर्जी, स्मृतियाँ प्रवेश कर जाती हैं, तो उनके जो रोग और कष्ट हैं, उनके जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कष्ट हैं, जिस शरीर में, जिसके जीवन में वो प्रवेश कर जाते हैं, उसको भोगने पड़ते हैं। चित्त की शुद्धि से वो उनसे बच जाता है।

हर चक्र में माँ

तो त्रिपुर सुंदरी, जो श्री दशमहाविद्या माँ महाकाली की अधिष्ठात्री है, वो आपको शक्ति प्रदान करती है और आपको ध्यान साधना का सही रास्ता दिखाती है। क्योंकि जितनी भी कुंडलिनी शक्ति है ना, हर चक्र पर वो माँ पहले से विराजमान है। शुरुआत से ही विराजमान है, मूलाधार से ही माँ है। तो बिना माँ के कुछ नहीं।

जैसे हमारे देश में शंकराचार्य जी थे, आदि शंकराचार्य। वो माया को नहीं मानते थे। ब्रह्म सर्वोपरि, वो ब्रह्म को ही मानते थे। माया को उन्होंने शुरुआत में नहीं माना। जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्होंने माया को स्वीकार किया कि है, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। तब तक काफी देर हो गई थी।

और गलत एनर्जी का चुनाव... किसी की भावनाओं को चोट न लगे, इसलिए हम दबी ज़ुबान में बात कह रहे हैं। गलत एनर्जी का चुनाव आपके जीवन को नष्ट कर देता है। गलत एनर्जी का चुनाव मृत्यु के द्वार पर पहुँचा देता है। बत्तीस-तैंतीस वर्ष की अवस्था में आदिगुरु आदि शंकराचार्य जी को शरीर त्यागना पड़ा। मुँह से खून की उल्टी होकर, गुदा द्वार से रक्त गिरते-गिरते, तमाम प्रकार के कष्टों को झेलते हुए उन्हें शरीर त्यागना पड़ा।

देव शक्तियाँ और दैत्य शक्तियाँ

जितनी ये दुष्ट शक्तियाँ पूरी सृष्टि में, पूरे ब्रह्मांड में विराजमान हैं, ये कभी भी, ये शक्तियाँ कभी भी... तो ये जो शक्तियाँ, अगर गलत एनर्जी आपके टच में आ गई और फिर माँ बनके बैठ गई, तो सिर्फ कष्ट है, सिर्फ रोग है। फिर कहीं कोई गति नहीं है।

तो ये दुष्ट शक्तियाँ क्या करती हैं? जो भी धर्म के लिए काम करता है, जो भी लोक कल्याण के लिए कार्य करता है, ये दैत्य शक्तियाँ उन पर सीधे अटैक करती हैं। और मैंने बार-बार कहा है, बार-बार कहता हूँ और हमेशा कहता रहूँगा, कि जो देव शक्तियाँ हैं, वो दैत्य शक्तियों से बहुत कमजोर हैं।

जैसे स्थूल जगत में, अगर नब्बे शरीफ आदमी बैठे हैं और दस गुंडे हाथ में पिस्तौल लेकर घुस जाएँ, तो नब्बे बेचारे चुपचाप बैठे रहते हैं — भाई, जो करना है कर लो। अगर नब्बे उठ के दसों पर गिर जाएँ, तो दस कुछ नहीं कर सकते। लेकिन वो उठेंगे नहीं, उठेंगे ही नहीं, बोलेंगे ही नहीं। ऐसा ही सूक्ष्म जगत में है। वहाँ पर भी ऐसा ही है, कि दैत्य शक्तियाँ इतनी प्रबल हैं कि वो देव शक्तियों को, देव पुरुषों को दबा देती हैं।

बाबा और माँ की छत्रछाया में

तो आप सब पहली बात तो परम सौभाग्यशाली हो कि आप सब ऐसी जगह बैठे हो, एक ऐसी छत के नीचे बैठे हो, जहाँ बाबा और माँ हैं। और मूल गुरु के रूप में बाबा हैं, जो सबको अपनी छाया के नीचे सुरक्षित रखते हैं। किसी में ज़रा भी गंदगी आती, तो आपकी प्रार्थना से ही एक क्षण में निकल जाती, तत्क्षण बाहर हो जाती। आपने आँख बंद की, प्रार्थना की और गायब, खत्म। तो ये बहुत अद्भुत है।

तो बहुत सुंदर रहा आज आप लोगों का जो अनुष्ठान था। ऐसे होते रहा करें, कभी महीने-दो महीने पर। जब भी आप लोगों को अवसर मिले, हम तो हमेशा तैयार हैं, आपको बस हमको बता देना है। बस वो पूर्णिमा और अमावस्या वाला टाइम न रहे, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। कभी भी हम लोग इस प्रकार टाई-अप करके ऐसे आवश्यक, अनिवार्य अनुष्ठान कर सकते हैं, ताकि स्वयं को और परिवार को स्वस्थ रख सकें और ध्यान साधना का जो अल्टिमेट कार्य है, हम उसको चला सकें।

ध्यान साधना भी करते रहें और परिवार पर, अपने आसपास ध्यान भी देते रहें। ध्यान भी देना है और ध्यान भी करना है, दोनों काम करने हैं। ध्यान देना और ध्यान करना।

तो आज का जो अनुष्ठान देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। और कोई प्रश्न हो, कोई बात हो, तो हम लोग चर्चा कर सकते हैं। अन्यथा फिर दस मिनट के लिए एक छोटा सा ध्यान साधना का सेशन किया जाए और फिर हम लोग समापन की ओर बढ़ेंगे। कोई प्रश्न हो, कोई आवश्यक वार्ता हो, कोई सार्वजनिक वार्ता हो, तो कर सकते हैं।

गौ सेवा

जो अपने साथ जुड़े हैं, संस्थान में जो भी लोग जुड़े हैं, काफी लोग तो गौ सेवा से जुड़े ही हैं। गौ सेवा का जो महात्म्य है, वो किताबों में नहीं लिखा है। उसको हम बहुत अच्छे से देखते हैं। मरते हुए आदमी को गौ अपना शरीर छोड़कर जीवन प्रदान करती है। अगर गाय से आपको लगाव हो गया, अगर गौ माता से आपका लगाव हो गया और गौ माता को आपसे लगाव हो गया, तो यमराज को भी छोड़ना पड़ता है। मैं इन चीज़ों को प्रत्यक्ष देखता हूँ।

इसीलिए पुरातन काल में, और अभी अगर मैं देखता हूँ, अभी से पचास साल पहले तक भी, हम लोग छोटे-छोटे थे तो देखते थे, हर घर में गाय थी, हर किसान के घर में गाय थी। ऐसा कोई घर नहीं था जहाँ गाय नहीं थी। और पचास-साठ साल पहले गौशालाएँ नहीं होती थीं, क्योंकि हर किसान के खूँटे पर गाय थी। गाय को सम्मान मिलता था, गौ वंश होता था, उससे खेती वगैरह होती थी।

तो उससे क्या रहता था? हर घर खुशहाल था। घरों में क्लेश नहीं होता था, रोग नहीं होते थे। नाना प्रकार की जो समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं, वो गौ सेवा से अपने आप समाप्त होती जाती थीं। इस तरह के परिवारों में बिखराव नहीं था।

गाय की अपनी एक आभा अलग है, आभा ही अलग है। गाय कोई पशु नहीं है। गाय तो एक प्रकार से देखा जाए तो सभी देवी-देवताओं का आधार है, उन्हें धारण करने वाली है। तो गौ माता की सेवा, गौ माता के प्रति लगाव अपने परिवार के लिए बहुत बड़ा कवच होता है।

हम इसको रोज़ देखते हैं। जब कोई बहुत बुरा फँसा होता है और एकदम से निकल आता है, तो मैं देखता हूँ कि क्या हुआ, ये कैसे बच गया। तो फिर दरबार दिखाता है कि गौ सेवा के पुण्य थे। तो मैं पूछता हूँ, तुम लोगों ने क्या गाय पाल रखी है? हाँ गुरुदेव, गाय है, पाल रखी है, दो गाय हैं, हम सेवा करते हैं। वो गौ सेवा का पुण्य आगे दिखता है, वो बचा ले जाता है।

बहुत स्ट्रॉन्ग है गाय की सेवा। माता-पिता की सेवा से कम नहीं है। जिसको माता-पिता की सेवा करने का अवसर मिले, वो गाय की सेवा ज़रूर कर ले। उससे उसकी पूर्ति हो जाती है, ऋण से मुक्ति होती है, कर्ज़ से मुक्ति होती है, माता-पिता के ऋण से मुक्ति होती है, सभी प्रकार के ऋणों से मुक्ति होती है। अगर कुछ नहीं कर पा रहा है, गुरु के लिए नहीं कर पा रहा है, अपने परिवार के लिए नहीं कर पा रहा है, तो गौ सेवा भी अगर करता है, तो उससे भी तमाम प्रकार के ऋणों से मुक्ति मिलती है। जो चार प्रकार के ऋण बताए गए हैं, उनसे उस सेवा से मुक्ति मिल जाती है।

गाय एक छोटा सा प्यारा नाम है। जैसे ही गाय आता है, अंदर से एकदम अविरल प्रेम बहने लगता है। गाय शब्द सुनते ही। अभी कहो भैंसा, भैंस — तो अभी मन खराब हो जाएगा। गाय — तो मन शांत हो जाता है। शब्द से, शब्द से, केवल गाय के चित्रण से। भैंस का चित्रण, किसी जानवर का नाम ले लो, वो पशु दिखाई देंगे। लेकिन गाय बोलते ही माँ का स्वरूप ध्यान में आता है। उधर कोई ख्याल ही नहीं आता कि ये जानवर है। अंदर से एक भाव रहता है, प्रेम।

तो गौ सेवा यज्ञ के समान है, हल्का काम नहीं है।

अमेरिका में गौ सेवा

आप सब लोग जो कर रहे हैं, देश के बाहर रहकर, अमेरिका में रहकर, बड़ा काम कर रहे हैं। छोटा काम नहीं, बहुत बड़ा काम है। अपने देश में तो कोई भी चार, छह, दस, पचास, सौ, दो सौ गाय पाल लेगा। वहाँ जाकर पालना! अपने लोगों को जोड़े रखना, अपने समाज के लोगों को जोड़ के रखना, मित्रों को जोड़ के रखना, गौ सेवा से जोड़ना।

तो पुरुषोत्तम जी ऋषि-मुनियों से बढ़ के काम कर रहे हैं। सरिता जी बेचारी लगी रहती हैं। आप लोग दोनों ऋषि-मुनियों से बढ़ के कार्य कर रहे हैं, बहुत बड़ा कार्य है। सबको जोड़ के रख रहे हैं, सबको उस पुण्य से जोड़ रहे हैं। वहाँ लोगों के पास गाय पालने की जगह कहाँ है? आप जो कर रहे हैं, बहुत ही स्वागतयोग्य है। और जहाँ तक हमारा ज्ञान है, हम तो हमेशा हैं ही।

और मुझे लगता है, बहुत जल्दी, अगले वर्ष की शुरुआत में, हम कहीं मेम्फिस में होंगे, आप सबके बीच में। हाँ, पुरुषोत्तम जी ने हमारा वीज़ा वगैरह सब कम्प्लीट करवा के रखा हुआ है। कुछ विशेष कारणों से अभी थोड़ा सा आना नहीं हो रहा। लेकिन तब तक हमने और पुरुषोत्तम जी ने विचार किया कि जब तक नहीं आ पा रहे हैं, तब तक इसी प्रकार के कार्यक्रमों से एक-दूसरे से जुड़े रहें, एक-दूसरे के सुख-दुख बाँटते रहें और ज्ञान और ध्यान के जो कार्यक्रम हैं, उनको आगे बढ़ाते रहें।

तो ये अवसर बनाया पुरुषोत्तम जी ने, सरिता जी ने, उनकी टीम ने। उनकी पूरी टीम को भी, सभी मित्रों को जो साथ में एक संगठन में जुड़े हैं, सभी को बाबा और माँ की ओर से बहुत-बहुत प्रेम, बहुत आशीर्वाद, कि आप सभी इसी प्रकार धर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहें और विदेशों में रहकर भारत की पताका फैलाते रहें। तो आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। थैंक यू। थैंक यू सो मच।

ये सब तुम लोगों का पुण्य फल है, सब आप लोगों का पुण्य फल है। आप लोगों के ही पुण्य से ये सब संभव होता है। अगर आप सबके पुण्य नहीं होते ना... और गौ सेवा के इतने पुण्य हैं सबके पास। जहाँ बैठे हैं, वो गौ तीर्थ है, एक प्रकार का तीर्थ स्थल है ये। तो ये सबके पुण्य आपके पास हैं।

और हमारा भी सौभाग्य है, परम सौभाग्य, कि हम आप सबके साथ जुड़ पाते हैं, वार्ता कर पाते हैं, आप सबको देख पाते हैं। तो आप सभी इसी प्रकार स्वस्थ रहें, सब सुखी रहें। और कोई विशेष प्रश्न हो तो चर्चा कर सकते हैं, अन्यथा संगीत के साथ दस मिनट का एक ध्यान साधना का कार्यक्रम किया जाए।

बहुत सुंदर, बहुत सुंदर, बहुत धन्यवाद। अच्छा, सोचो तो पूरे अमेरिका में गाय फैल जाएगी, पूरा अमेरिका गौ तीर्थ हो जाएगा... स्मृतियाँ फैल जाएँगी, खूब फैलेगा। बहुत बड़ा, बहुत कम है। बहुत बढ़िया।

चाहे जब, जिधर भी प्रोग्राम रखना हो, हम कभी भी तैयार हैं। इस तरह से भी, इस स्क्रीन पर भी हम लोग तैयार हैं, उससे कोई प्रॉब्लम नहीं, इससे कोई फर्क पड़ता नहीं। जैसे वहाँ सामने होंगे, वैसे ही यहाँ भी सामने हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता। और दरबार की माँ की कृपा है, गुरुदेव की कृपा है कि हम लोग किधर भी रहें, काम वही होगा। जो सामने बैठे होगा, वही होगा, और दूर हैं तब भी होगा। दूरी, जो डिस्टेंस है, उसका कोई मतलब नहीं है, क्योंकि सब जुड़ा हुआ है, कोई भी डिस्टेंस नहीं है।

तो दरबार का उद्देश्य यही है कि आप सभी लोग स्वस्थ रहें। और जब आप लोग गौ सेवा से जुड़े होते हैं, तो मुझे आसानी होती है, उसको स्वस्थ करने में, पॉज़िटिव करने में टाइम नहीं लगता, सेकंडों में होता है। जब गौ सेवा के पुण्य अपने पास रहते हैं... मैंने बोला ना, सभी पुण्यों से बढ़ कर — ब्राह्मण सेवा, माता-पिता की सेवा, गुरु की सेवा, समाज की सेवा, सबकी सेवा — गौ सेवा ही कर लो, उसी से पूरी हो जाती है। इतना बड़ा महात्म्य है गौ माँ का, गौ माता का।

पहले मनुष्य का जन्म कैसे हुआ

तो हम लोगों ने शायद आपसे डिस्कस किया कि नहीं किया, कि एक बार हमने बाबा से पूछा कि मनुष्य का जन्म कैसे हुआ होगा, पहले मनुष्य का जन्म? तो बाबा ने... हमने पूछा, उन्होंने फटाक से उत्तर दे दिया, बगैर सोचे। उन्होंने कहा कि बेटा, गाय के पेट से, पहले मनुष्य का जन्म गाय के पेट से हुआ। तो बात आई-गई हो गई, मैंने कहा, बोल दिया होगा उन्होंने। मैं साइंस का स्टूडेंट था, विज्ञान का विद्यार्थी था।

तो फिर धीरे-धीरे कालांतर में पता लगा कि मनुष्य जाति में जब बच्चा माँ के पेट में होता है, तो जिन जीवाणुओं से माँ के गर्भ में उसका पालन होता है... जब वो बच्चा जन्म लेता है, तो माँ के मासिक धर्म के रक्त से हमारा निर्माण होता है, उसी से पूरी सृष्टि चलती है, मनुष्य जाति चलती है। हमारा शरीर माँ के मासिक धर्म के रक्त से बनता है, जिसको लोग गंदा कहते हैं।

तमाम संत और तमाम लोग ऐसे हैं, विद्वान लोग, जो बड़े विद्वान हैं, किताबें पढ़-पढ़ के विद्वान हो गए, तो माँ को बोलेंगे कि वो अशुद्ध है, अपवित्र है। तो फिर मैं कहता हूँ, भई, तुम तो सबसे बड़े अपवित्र हो, तुम्हारा तो निर्माण ही माँ के मासिक धर्म के रक्त से हुआ है, तो तुमसे बड़ा तो कोई अपवित्र है ही नहीं। माँ एक शब्द है।

तो जब जन्म लेते हैं, तो वही मासिक धर्म माँ के स्तन से दूध के रूप में निकलता है। तो वही जीवाणु जो माँ के गर्भाशय में हमारा लालन-पालन करता है, जिसके दम पर हम माँ के गर्भ में जिंदा रहते हैं, वही उसके स्तन से दूध के रूप में बाहर आता है। और बच्चा दुग्ध पान करता है और उसी जीवाणु से उसका पालन होता रहता है। तो फिर ये बात समझ में आई कि वही जीवाणु जो माँ के गर्भाशय में हमारा लालन-पालन करता है, वही जीवाणु जो बाहर माँ के दुग्ध में हमारा लालन-पालन करता है, वही जीवाणु केवल देशी गाय के दूध में पाया जाता है, बाकी वो जीवाणु कहीं नहीं पाया जाता। और फिर इसलिए जब माँ को दुग्ध नहीं होता, तो उसको गाय का दूध दिया जाता है, तो वो उसको सीधे सूट करता है। तो इसीलिए भी वो लोग...

तो यही बात है, यही कारण था कि हमारे सभी ऋषि-मुनि जंगल में भी गए। जब अपने घर में थे, समाज में रहते थे, तब भी गए। और गाय के ऊपर तो बड़े-बड़े युद्ध हुए हैं। सहस्रबाहु का चाहे झगड़ा रहा हो, चाहे भगवान परशुराम से जुड़ा रहा हो, चाहे विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ जी से रहा हो, ये सब गाय के ऊपर बहुत बड़े-बड़े युद्ध हुए हैं। गाय का इतना बड़ा महत्व था, बहुत बड़ा महत्व था।

तो आज हमने उस महत्व को भुला दिया है और गाय हमारे जीवन से बाहर हो गई। बड़े अभागे हैं वो लोग जो गाय की सेवा नहीं कर पाते, जिनको गौ सेवा करने को नहीं मिलती। वो वाकई में बहुत अभागे लोग हैं।

दिव्यभूमि उत्तराखंड

हम लोग भी कभी-कभी सोचते हैं कि गाय पालते तो हैं, लेकिन फिज़िकली जो गाय की सेवा है, वो आवश्यक है। अभी जहाँ मठ में रहते हैं, यहाँ उत्तराखंड का जो पशुपालन मंत्रालय है, उनके लोगों को मैंने बुलाया, वो मिलने आए थे। तो अभी मैंने यहाँ मिश्री मठ में भी गाय की योजना की, कि यहाँ भी खाली न रहे, यहाँ भी अच्छी-अच्छी गायें पाली जाएँ।

और देहरादून में यहाँ एक बड़ी गौशाला है, उसको लेकर यहाँ माननीय मुख्यमंत्री जी से मेरी वार्ता चल रही है। बड़ी गौशाला है, जिसमें मेरे ख्याल से करीब दस हज़ार गायों को रखने की क्षमता है। तो वो गवर्नमेंट के पास है, ठीक से चल भी नहीं पा रही। सात-आठ सौ गायें उसमें हैं। तो उसको गोद लेने का विचार चल रहा है और उस पर चर्चा चल रही है। हो जाएगा तो फिर वो तीस वर्षों के लिए हो जाएगी।

तो ये जो देवभूमि है ना — उत्तराखंड को देवभूमि उत्तराखंड कहा जाता है ना — तो आज हम लोगों को माँ का संदेश आया कि इसका नाम बदल दो, देवभूमि का। तो आज इसका नाम हम लोगों ने पर्सनली अपने लिए रखा दिव्यभूमि उत्तराखंड। जहाँ दिव्य का अर्थ होता है — दिव्यता का अर्थ होता है पूर्णता, पूर्णता। जो सबमें प्रकाशित है, सब उसके अंदर है, जो प्रकाशवान है, जो सबमें प्रकाशित है, वो दिव्य है। उसे दिव्य कहा गया, जो सब जगह व्याप्त है। तो ये दिव्यभूमि है, देवभूमि नहीं। केवल देवताओं की नहीं, ये गुरुओं की, तपस्वियों की, ऋषि-मुनियों की भूमि है।

तो इसलिए गाय की सेवा सर्वोत्तम है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य अच्छा बना रहे, उसके लिए गौ सेवा बहुत आवश्यक है। तो पुरुषोत्तम जी वो काम कर ही रहे हैं। बड़ा काम है, इतना बड़ा जिम्मा लेना भी छोटा काम नहीं है। तो आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। बढ़ाइए, आप लोग सब जुड़े हुए हैं और धीरे-धीरे फैल रहे हैं, चीज़ों को फैला रहे हैं। ये बहुत पुण्य का काम है। अगली पीढ़ी भी जुड़ रही है।

ममता से उत्पन्न दूध

मैंने गाय के, गौ माता के प्रभाव को देखा है। मेरे दो पुत्र हैं, तो उन्हें पहले दिन से ही देशी गाय, गौ माता का अमृतपान करने का सौभाग्य मिला। और आज तक वो कहीं भी जाते हैं, तो बाहर कोई दूध नहीं पीते। दूध ही नहीं, कितना भी दूध आ जाए, रबड़ी बन के आ जाए, वो नहीं खाते, पी नहीं सकते। कहते हैं, बदबू आती है। गाय का दूध आप दे दीजिए, वो तुरंत पी लेंगे। इतना उनको उससे लगाव है।

तो हमने भी अपने आप को सोचा कि हम भी बड़े सौभाग्यशाली थे। अपने जीवनकाल में हमने तो दूध पिया ही, गाय का भी पिया, बकरी का भी पिया। आयुर्वेद में कहा गया, जब गाय का दूध न मिले तो बकरी के दूध पर जाओ, फिर भैंस के दूध पर जाओ, अन्यथा कहीं और विकल्प में जाओ। लेकिन गाय का दूध जो है... गाय के दूध को कहा गया माँ का दूध।

और गाय के दूध को बड़ा सुंदर नाम दिया — ममता के भाव से उत्पन्न हुआ रस। जिसे हम दुग्ध कहते हैं, वो ममता के भाव से उत्पन्न होता है। गाय अगर अपने बछड़े को प्यार नहीं करेगी ना, तो उसका दूध ठीक से नहीं उतरेगा। जैसे ही अपने बछड़े को, बछिया को, बच्चे को लाड़-प्यार करती है, वैसे ही उसका दूध उतर जाता है, और तुरंत सब लोग दूध लेते हैं, फटाफट, फटाफट। ऐसे ही माँ का है। उसका बच्चा सामने खेल रहा होता है, ज़रा सी उसको ममता आ जाती है, उसका दूध बहने लगता है। तो ममता के भाव से उत्पन्न हुआ रस, ये दुग्ध है।

टीका लगा के, इंजेक्शन लगा के ज़बरदस्ती दुहना — ये दुग्ध नहीं है, वो ज़हर है, फिर ज़हर है। तो भाव ही प्रधान है, सबसे बड़ा। जिस भाव से वो दुग्ध बाहर निकल के आया है, उसके पान से वही भाव आप में स्थिर रहेगा, वही भाव आप में रहेगा। तो अमृत है गाय का दूध।

निर्देशित ध्यान: तीन ग्रंथियाँ

चलिए, बहुत सुंदर है। सब लोग तैयार हों, तो दस मिनट की ध्यान साधना कर ली जाए। सब लोग अपने-अपने बाल, चोटी खोल लेंगे, और एक दस मिनट का ध्यान साधना है।

सभी आराम से मुद्रा में बैठें। जो पालथी लगा के बैठ सकते हैं, तो पालथी लगा के बैठें। और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखना है। चेहरा हल्का सा उठा के ऐसे रखना है, ताकि पीछे का जो मेडुला है, रीढ़ की हड्डी, एकदम सीधी रहे, नीचे न झुकी रहे। ऐसे सीधे उठा के रखना है।

और दोनों हाथों की उँगलियों को आपस में फँसा करके नाभि के पास रखना है। दोनों हाथों की उँगलियों को आपस में फँसाएँ और फँसा करके नाभि के पास रखना है। नेत्र बंद कर लेना है।

सभी लोग नेत्र बंद करके अपने-अपने हृदय में भगवान भोलेनाथ का ध्यान करेंगे, शक्ति स्वरूपा माता कामाख्या को प्रणाम कर लेंगे, परम पूज्य बाबा जी को और गुरुमाता जी को प्रणाम करके, दरबार में प्रतिष्ठित माता महाकाली को प्रणाम कर लेंगे।

बाबा से, माँ से प्रार्थना कर लेंगे कि हम ध्यान साधना करने का, ध्यान को साधने का प्रयास कर रहे हैं, हम कुंडलिनी साधना करने जा रहे हैं, कृपा करके हमारा मार्गदर्शन और हमारी रक्षा करने की कृपा करें।

ॐ।

[अस्पष्ट वाक्य।] इनका भूत और भविष्य स्तंभित कर दिया जाए, रोक दिया जाए। वर्तमान रखा जाए।

अपना पूरा ध्यान अपनी नाभि पर रखेंगे। और ध्यान रखना है कि शुरुआत में हमारे दो चक्र हैं, मूलाधार और स्वाधिष्ठान। उसके ऊपर दो चक्र हैं, मणिपुर और अनाहत। फिर उसके ऊपर दो चक्र हैं, विशुद्धि और आज्ञा चक्र। तीनों ही जगह पर एक-एक ग्रंथि है। सबसे नीचे ब्रह्म ग्रंथि है। अनाहत के पास जो दूसरी ग्रंथि है, वो विष्णु ग्रंथि है। और तीसरी ग्रंथि, जो विशुद्धि और आज्ञा चक्र के बीच में है, वो महेश ग्रंथि के नाम से जानी जाती है। ये तीन ग्रंथियाँ हैं।

ये बिना खुले, बिना शक्ति के, बिना माँ के, खुलती नहीं। और ये तीनों खुलने के लिए विशेष आयोजन करना होता है। दरबार में चूँकि ये सभी सिद्ध हैं, इसलिए ये स्वतः ही खुल जाती हैं।

तो सबसे पहले अपना ध्यान भगवान श्री गणेश पर केंद्रित करना है, जो कुंडलिनी का द्वार खोलने के लिए अधिकृत हैं। वही कुंडलिनी द्वार, जहाँ माँ विराजमान है। और शिव के अपने आज्ञा चक्र तक पहुँचने का रास्ता भी वही है। गणेश जी ने जब द्वार खोलने से मना किया, तो वो भोलेनाथ के क्रोध का कारण बने और शीश काटा गया। बाद में कथा है कि उन्हें हाथी का सिर लगाया गया। माँ वहाँ विराजमान है।

तो सबसे पहले भगवान श्री गणेश से प्रार्थना करेंगे कि वो गणेश द्वार खोल दें, ताकि हम अपनी कुंडलिनी यात्रा कर सकें और ध्यान साधना में आगे बढ़ सकें। प्रार्थना करें कि वो द्वार खोल दें। तीन बार बोल दीजिए:

ॐ श्री गणेशाय नमः। ॐ श्री गणेशाय नमः। ॐ श्री गणेशाय नमः।

इसके पश्चात अब ब्रह्मा जी को प्रणाम करेंगे, ब्रह्म को प्रणाम करेंगे और उच्चारण करेंगे। उसके पहले प्रार्थना कर लें कि ब्रह्म ग्रंथि खोलने की कृपा करें, तो तीन बार उच्चारण कर लेंगे:

ॐ श्री ब्रह्मदेवाय नमः। ॐ श्री ब्रह्मदेवाय नमः। ॐ श्री ब्रह्मदेवाय नमः।

ब्रह्म ग्रंथि खोल दीजिए।

और अपनी नाभि से थोड़ा ऊपर ध्यान ले जाएँगे, थोड़ा सा ध्यान ऊपर ले जाएँगे अपने अनाहत चक्र के पास, अपने हृदय क्षेत्र पर, चेस्ट के बीचों-बीच, जहाँ पर अनाहत चक्र है। हम भगवान नारायण का स्मरण करते हुए, जैसे क्षीरसागर में लेटे हुए भगवान नारायण, उनसे प्रार्थना करते हुए कि विष्णु ग्रंथि खोलें, ताकि हम आगे की यात्रा कर सकें। और तीन बार उच्चारण कर लीजिए:

ॐ नमो नारायणाय। ॐ नमो नारायणाय। ॐ नमो नारायणाय।

भगवान नारायण, विष्णु ग्रंथि खोल दें।

अब धीरे-धीरे अपना ध्यान थोड़ा और ऊपर ले जाएँगे। विशुद्धि चक्र से होते हुए, गले से, मुख से, नासिका से होते हुए अपने मस्तक पर आज्ञा चक्र पर, शिवनेत्र पर, अपनी दोनों भौंहों के बीच में, जहाँ पर माताएँ-बहनें बिंदी लगाती हैं। इस शिवनेत्र पर, कूटस्थ पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे।

भगवान शिव से, भोलेनाथ से प्रार्थना करते हुए कि जब भी हम योग्य हों, इस योग्य हो जाएँ और गुरुदेव की आज्ञा हो, अनुमति हो, तो हमारी महेश ग्रंथि भी खोलने की कृपा करें। और मेरे साथ तीन बार उच्चारण करेंगे:

ॐ श्री महेश्वराय नमः। ॐ श्री महेश्वराय नमः। ॐ श्री महेश्वराय नमः।

ॐ। फिर रुद्र ग्रंथि खोल दीजिए, लेकिन सहस्रार से ऊपर बंद रखा जाए, ताकि सभी लोग ध्यान साधना के बाद वापस अपने शरीरों में लौट सकें, क्योंकि धरती पर अभी बहुत काम है।

ब्रह्मांड की यात्रा

सभी लोग अपना ध्यान अपने आज्ञा चक्र पर स्थिर कर लें। अपने आज्ञा चक्र पर अपना ध्यान स्थिर कर लें, पूरा ध्यान वहीं पर। आठ-दस बार गहरी-गहरी श्वास लें और छोड़ें। खूब गहरी खींचें और खूब गहरे से छोड़ें। खूब गहरे से खींचें और खूब धीरे-धीरे बाहर की ओर फेंकें। ऐसे आठ-दस बार डीप ब्रीथ करेंगे और छोड़ेंगे।

अभी ये संगीत बजेगा। उस संगीत पर आपको केंद्रित रहना है, ध्यान उसी पर अपना रखना है, पूरा ध्यान उसी पर। और आप पाएँगे कि आप स्थिर रहेंगे, आप न भूतकाल में गति कर पाएँगे, न भविष्य में गति कर पाएँगे, वर्तमान में ही बने रहेंगे। ये दरबार की शक्ति है, जो मेरे द्वारा संचालित होती है।

और वर्तमान में रहते हुए ही आप किसी घटना के घटित होने का इंतज़ार कर सकते हैं। वर्तमान में ही घटनाएँ घटित होती हैं, कोई घटना भूत और भविष्य में घटित नहीं होती। वर्तमान में रहते हुए हम आगे की यात्रा करेंगे, ब्रह्मांड की यात्रा करेंगे। जितने गहरे आपके पुण्य होंगे, जितना आपका अभ्यास होगा, उतनी तेज़ी से आप चलेंगे।

तो पूरा-पूरा ध्यान अपने आज्ञा चक्र पर, और जो ध्वनि सुनाई देगी, उस पर साथ-साथ पूरा ध्यान बनाए रखेंगे। जितना गहरा आप ध्यान बनाएँगे, जितनी गहराई से आप संगीत को पकड़े रहेंगे — संगीत की ये धुन आपसे न छूटे — उतना गहरे आप ध्यान में जाने वाले हैं, उतना ही आपको आनंद आने वाला है। तो सभी लोग इस पर ध्यान देंगे।

ॐ।

वापसी

सभी लोग वापस अपने-अपने आज्ञा चक्र पर आ जाएँ। इस ब्रह्मांडीय यात्रा से सभी लोग वापस अपने-अपने आज्ञा चक्र पर। पूरा ध्यान अपने आज्ञा चक्र पर। सभी लोग वापस, पूरा ध्यान धीरे-धीरे आज्ञा चक्र पर लाएँ। धीरे-धीरे, धीरे-धीरे अपने आज्ञा चक्र पर पूरी तरह आ जाएँ। पूरा ध्यान आज्ञा चक्र पर।

अब धीरे-धीरे नीचे की ओर उतरेंगे। दोनों आँखों के बीच से, नासिका से, मुख से होते हुए, गले से होते हुए, विशुद्धि चक्र क्रॉस करते हुए अपने अनाहत पर, हृदय क्षेत्र के बीचों-बीच ध्यान करते हुए, भगवान नारायण का स्मरण करते हुए, और नीचे अपनी नाभि पर, मणिपुर चक्र पर स्थिर हो जाएँगे। पूरा ध्यान अपने नाभि चक्र पर, पूरा-पूरा ध्यान।

तीन बार बोलेंगे: ॐ नमः शिवाय। तीन बार: ॐ नमो नारायणाय।

अब दोनों हथेलियाँ आसमान की ओर ऊपर उठाएँ। अपनी-अपनी दोनों हथेलियाँ आसमान की ओर ऊपर उठाएँ और एक लंबी, गहरी साँस अंदर खींचें और ॐ की ध्वनि का लंबा उच्चारण करेंगे। ॐ... ऐसे दो बार और करेंगे।

तीन बार ॐ नमः शिवाय का उच्चारण करेंगे:

ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवाय। ॐ नमः शिवाय।

तीन बार तालियाँ बजाएँगे। दोनों हथेलियाँ अपनी जाँघों पर रखेंगे और तीन बार थपकी देंगे। अब दोनों हथेलियाँ आपस में रगड़ेंगे और अपने-अपने नेत्रों पर रखेंगे। ऐसे दो बार और करेंगे। तत्पश्चात धीरे-धीरे, धीरे-धीरे करके अपने-अपने नेत्र खोल देंगे।

बहुत सुंदर। ये वाला जो ध्यान कराया गया, ये रोज़ कर सकते हैं। इसी म्यूज़िक को लगाया और दस मिनट का ध्यान किया, चाहे समूह में बैठ के किया, चाहे अकेले किया। ये कर सकते हैं।

दूर रहकर विजयादशमी का उत्सव

तो बहुत अच्छा रहा आज का कार्यक्रम। पुरुषोत्तम जी, बहुत सुंदर, बहुत अच्छा लगा। और मैं भी आप लोगों के साथ खूब आराम से बैठा हूँ। दशहरा मनाने का मौका मिला, विजयादशमी का त्योहार आप सबके साथ मनाने का अवसर प्राप्त हुआ आज। आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद कि आप लोगों ने मौका दिया कि आपके साथ त्योहार मनाएँ। तो इधर तो आज दशमी है और उधर नवमी है। आपकी दशमी हो गई?

तो अभी किस-किस प्रांत से लोग इसमें जुड़े हैं? गुजरात, तमिलनाडु, साउथ इंडिया, आंध्र प्रदेश, गुजरात। लेकिन नब्बे प्रतिशत... [अस्पष्ट अंग्रेज़ी अंश।]

इससे क्या होगा ना, वो पुण्य फल और सक्रिय रहेगा, और सब बहुत आराम में, आनंद में रहेंगे, इससे और आनंद में रहेंगे सारे। और इसी बहाने एक-दूसरे के सुख-दुख का पता भी लगता रहेगा, सब लोग जुड़ते रहेंगे।

हरि हर, हरि हर, हरि हर! कैसे हो आप? हम मस्त हो रहे हैं। अच्छा है, अच्छा है। अच्छी बात है, बहुत अच्छी बात है।

प्राचीन विज्ञान और युवा

इस पर बैठ के आराम से चर्चा करेंगे और इस काम को आगे बढ़ाएँगे, इसको बहुत नए तरीके से आगे बढ़ाएँगे। ये बड़ा विज्ञान है और नवयुवकों के बीच, जिज्ञासुओं के बीच का विषय है। अभी इसी विषय पर भारत के कुछ अच्छे लोगों से, जिनका बड़ा फेम है, मेरी चर्चा हुई, तो वो लोग भी इस पर काफी आशान्वित हैं और काफी रोमांचित हैं। तो अच्छा है।

इस पर जब हम लोग बैठ के और गहराई में चर्चा करेंगे, कि इसको कैसे आगे ले जाना है, किस थीम पर इसको आगे ले जाना है, तो अच्छा रहेगा। प्रचार-प्रसार का अच्छा तरीका भी है और एक अच्छा, रचनात्मक कार्य भी है। तो इस पर हम लोग अच्छे से काम कर पाएँगे। बहुत अच्छा सोचा है। हाँ, बहुत अच्छा है।

हमारे देश में, खास तौर से नवयुवकों में, आज धर्म को लेकर, पुरातन विज्ञान को लेकर बहुत क्यूरियोसिटी है। और वो कोई अचानक से नहीं आई है, अचानक से नहीं आई है। धीरे-धीरे करके दकियानूसी लोगों से एक जो बोरडम उत्पन्न हुआ है, उसके कारण वो चीज़ें बच्चों में प्रश्न के रूप में आईं कि क्या जो किताबों में है, वही सब है, क्या उसके आसपास भी कुछ है?

कल मेरे साथ भारत का एक बड़ा नाम, भारतवर्ष में आचार्य बालकृष्ण जी थे। उनके साथ मेरे कुछ कार्यक्रम थे, तो वो करीब पाँच-छह घंटे मेरे साथ थे। तो इसी बात पर चर्चा होती रही। उन्होंने बड़ा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मेरी इतनी उम्र हो गई, और मैंने बहुत रिसर्च की है, बहुत लोगों से मिला हूँ, हज़ारों-हज़ारों लोगों से मिला हूँ, लेकिन हमारी जो वैदिक चीज़ें हैं, उनको हम प्रमाणित नहीं कर पाए।

लेकिन उन्होंने कहा कि जो आप कर रहे हो ना, ये बड़े प्रमाण के साथ कर रहे हो, ये अद्भुत है। तो इसको लिपिबद्ध होना चाहिए, इस पर रिसर्च होनी चाहिए, रिसर्च पेपर तैयार होने चाहिए, और जो रिसर्च हो, वो एक बड़ी प्रॉपर्टी बननी चाहिए। प्रमाणित रूप में सामने रखा जाए कि भाई, आपने ऐसा किया, तो ऐसा होगा।

जैसे छुरी से सेब को ऐसे काटा, तो सेब कटेगा ही कटेगा। वो चाहे कश्मीर का सेब हो, चाहे विदेश का सेब हो, चाहे कहीं का हो, कटेगा ही कटेगा। हाँ? तो ऐसे ही ये विज्ञान है। अगर लोग इसका पालन करेंगे, तो ये परिणाम आएगा ही आएगा। ऐसा नहीं होगा कि सौ लोग करेंगे तो पचास को परिणाम आएगा और पचास को नहीं आएगा। फिर वो विज्ञान नहीं है, फिर विज्ञान नहीं है।

तो इसलिए अच्छी बात है कि आज का नवयुवक चीज़ों को समझना चाहता है, जानना चाहता है। और अगर उसको कहीं प्रामाणिकता मिलती है, तो फिर वो उसको छोड़ता नहीं है।

और अमेरिका जैसे देश के बारे में हमारे आचार्य राजीव भैया हमेशा कहते रहते हैं कि गुरुदेव, अमेरिका जैसे देश में जो सबसे अद्भुत बात है, वो ये कि योग्यता को बहुत बड़ा सम्मान है, बहुत बड़ा सम्मान। उस दिन स्वामी रामदेव जी हमारे साथ थे, वो भी डिट्टो यही बोल रहे थे कि गुरुदेव, योग्यता का जो सही-सही सम्मान है, वो अमेरिका में है। इसमें कोई संदेह नहीं। खुद बोल रहे थे इस बात को।

ये विज्ञान है

तो इसलिए अच्छा है कि कोई चीज़ प्रामाणिक रूप में सामने आए। आपके पास बहुत प्रमाण हैं। मतलब हज़ारों-हज़ारों, पचासों हज़ार प्रमाण तो वो लोग हैं जो स्वस्थ हैं। जो लोग भी विधि का पालन कर रहे हैं, प्रार्थना और संकल्प से दरबार से जुड़ के, ऊर्जा उनके पास है, तो वो निश्चित रूप से बहुत आनंद में हैं। जो ज़रा भी उससे हट करके कुछ काम करे, तुरंत कष्ट में आते हैं। इमीडिएट।

विज्ञान है, बहुत बड़ा विज्ञान है। पहले लोग जानते नहीं थे, तो सोचते रहे कि ऐसे हो गया होगा, उसके कारण हो गया होगा, इसके कारण हो गया होगा, इसलिए हो गया होगा। अब जब विज्ञान को समझ गए, तो साफ-साफ दिखता है कि मेरी इस गलती के कारण मुझे नुकसान हुआ। साफ-साफ दिखता है कि मैंने इस विधि का पालन किया और मुझे तुरंत ये लाभ हुआ।

तो साफ-साफ दिखता है, सारा विज्ञान सम्मत है। धूप में खड़ा हुआ तो गर्मी लग रही है, और छाया में खड़ा हुआ, एसी में गया, तो ठंडक लग रही है। स्पष्ट है। ऐसा नहीं है कि एसी में रहेगा तो गर्मी लगेगी और धूप में खड़ा होगा तो सर्दी लगेगी। एकदम विज्ञान सम्मत है सब।

तो बहुत बढ़िया, अच्छा है, अच्छा विचार है। इसको सोचने के पीछे ज़रूर कुछ अच्छी वजह होगी, और इससे अच्छा ही होगा। तो बहुत बढ़िया है। आगे बढ़िए इस पर। हमारी तरफ से जो भी सहयोग होगा, हम करेंगे, इसको आगे बढ़ाएँगे।

आशीर्वाद

तो बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आप सभी को, बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। आप सब लोगों ने भी इतना समय दिया सुनने के लिए और बात करने के लिए, अवसर दिया, बहुत अच्छा है। बहुत थैंक यू सभी को। जो लोग ज़ूम मीटिंग में जुड़े हैं, सभी लोगों को बहुत-बहुत धन्यवाद, बहुत शुभकामनाएँ।

आपका जीवन उन्नत हो, आप और आपका परिवार सुखी हो, आप सभी समृद्ध हों, आप सभी समृद्ध हों। और सृष्टि के काम में पूरा हाथ आगे बढ़ाएँ और सृजन में आगे बढ़ें आप सभी। मानव जाति जो सृजन कर सकती है, संसार में कोई और नहीं कर सकता। तो सृजन के काम में आगे बढ़ें आप सभी।

आप सभी को बाबा और माँ की ओर से, दरबार की ओर से बहुत-बहुत प्रेम, बहुत आशीर्वाद। आप सभी स्वस्थ रहें, सुखी रहें और दीर्घायु हों। थैंक यू।

आध्यात्मिक और संस्कृत शब्दावली

यह शब्दावली उन प्रमुख आध्यात्मिक, दार्शनिक और धार्मिक शब्दों को समझाती है जिनका प्रयोग गुरुदेव अपने प्रवचन और सामूहिक ध्यान में करते हैं। जहाँ गुरुदेव किसी शब्द की विशिष्ट आध्यात्मिक व्याख्या करते हैं, वहाँ हम उसे शब्द के सामान्य अर्थ से अलग रखते हैं।

1. मूल आध्यात्मिक और दार्शनिक अवधारणाएँ

शब्दअर्थ
शक्तिदिव्य ऊर्जा, ब्रह्मांड की गतिशील और सृजनात्मक सामर्थ्य। गुरुदेव की व्याख्या में यह वह सक्रिय तत्त्व है जो उत्पत्ति, गति, परिवर्तन और विनाश को संभव बनाता है। इसका संबंध दिव्य माँ और ईश्वर के स्त्री-रूप से है।
बलगुरुदेव इस शब्द से उस सर्वव्यापी, स्थिर तत्त्व को इंगित करते हैं जो वस्तुओं की व्यवस्था और उनकी परिधि को बनाए रखता है। वे इसे गतिशील शक्ति से अलग करते हैं।
ब्रह्मभारतीय दर्शन की परम, सर्वोच्च और सर्वव्यापी सत्ता, जो देश, काल और किसी भी रूप से सीमित नहीं है।
ईश्वरपरमेश्वर, सर्वोच्च स्वामी या दिव्य तत्त्व। कुछ दार्शनिक परंपराओं में यह परम सत्ता का सगुण पक्ष है।
जीवव्यक्तिगत प्राणी या व्यक्तिगत आत्मा, जिसका संबंध चेतना, कर्म और जन्म-मरण के चक्र से है।
मायासृष्टि के प्रकट होने की ब्रह्मांडीय शक्ति। अद्वैत वेदांत में इसे परम सत्य के ज्ञान पर पड़े आवरण से भी जोड़ा जाता है।
धर्मब्रह्मांडीय व्यवस्था, सत्कर्म, कर्तव्य और आध्यात्मिक नियम; व्यापक अर्थ में सत्य और सार्वभौमिक सिद्धांतों के अनुरूप जीवन।
कर्मकार्य और उसके परिणाम, जो प्राणी के आगे के अनुभवों को प्रभावित करते हैं।
भावआंतरिक अनुभूति, दृष्टिकोण या आध्यात्मिक मनःस्थिति। गुरुदेव प्रार्थना, ध्यान और सेवा में भाव को सर्वोपरि मानते हैं।
अमृतअमरता का रस; आध्यात्मिक भाषा में दिव्य सार, आनंद का रस या जीवनदायी तत्त्व।

2. चेतना, मन और सूक्ष्म शरीर

शब्दअर्थ
मनइंद्रियों से जुड़ा, भावनात्मक और विचारात्मक पक्ष, जिसमें विचार, इच्छाएँ और संशय उत्पन्न होते हैं। गुरुदेव के अनुसार इसकी शुद्धि भजन से होती है।
बुद्धिविवेक और निर्णय की क्षमता, जो सही और गलत में भेद करती है। गुरुदेव के अनुसार इसकी शुद्धि सेवा से होती है।
चित्तआंतरिक चेतन मन, जिसमें संस्कार, स्मृतियाँ और गहरी मानसिक छापें संचित रहती हैं। गुरुदेव के अनुसार इसकी शुद्धि ध्यान साधना से होती है।
स्थूल शरीरभौतिक, दृश्य और स्पर्शयोग्य शरीर।
सूक्ष्म शरीरमन, प्राण और इंद्रिय-शक्तियों से बना सूक्ष्म शरीर, जो स्थूल शरीर का संचालन करता है।
कारण शरीरपरंपरागत तीन शरीरों में सबसे सूक्ष्म, जिसका संबंध व्यक्तिगत अस्तित्व के गहरे कारणों और कर्म-संस्कारों से है। गुरुदेव अपने प्रवचन में अन्य कारण शरीरों के प्रभाव का भी वर्णन करते हैं।
संस्कारपिछले अनुभवों और कर्मों से बनी गहरी मानसिक या कर्मगत छाप।

3. ध्यान और आध्यात्मिक साधना

शब्दअर्थ
साधनाआंतरिक विकास, चेतना की शुद्धि और आध्यात्मिक सिद्धि के लिए व्यवस्थित अभ्यास।
ध्यानएकाग्र चेतना और गहरी आंतरिक तल्लीनता की अवस्था।
कुंडलिनी शक्तिरीढ़ के मूल में सुप्त मानी जाने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा, जिसका जागरण आध्यात्मिक रूपांतरण से जुड़ा है।
चक्रसूक्ष्म ऊर्जा-तंत्र का केंद्र।
ग्रंथिगाँठ; कुंडलिनी के ऊर्ध्वगमन के मार्ग की ऊर्जात्मक बाधा।
ब्रह्म ग्रंथितीन प्रमुख ग्रंथियों में पहली, निचले चक्रों और भौतिक आसक्ति से संबद्ध।
विष्णु ग्रंथिदूसरी ग्रंथि, हृदय क्षेत्र और भावनात्मक आसक्तियों से संबद्ध।
रुद्र ग्रंथितीसरी ग्रंथि, उच्च चेतना और अहंकार के सूक्ष्म रूपों से संबद्ध। गुरुदेव इसे महेश ग्रंथि भी कहते हैं।
कूटस्थचेतना का अपरिवर्तनशील तत्त्व; कुछ योग परंपराओं में भौंहों के बीच का ध्यान-बिंदु।
मंत्रध्यान, प्रार्थना और अनुष्ठान में प्रयुक्त पवित्र अक्षर, ध्वनि या सूत्र।
ॐपरम सत्य और मूल ब्रह्मांडीय नाद का प्रतीक पवित्र अक्षर।
संकल्पसचेत निश्चय, उद्देश्य या आध्यात्मिक प्रतिज्ञा।

4. चक्र और ऊर्जा केंद्र

शब्दअर्थ
मूलाधाररीढ़ के मूल में स्थित पहला चक्र, स्थिरता और मूल जीवन-ऊर्जा से संबद्ध।
स्वाधिष्ठानपेट के निचले भाग में स्थित दूसरा चक्र, भावनाओं और सृजनात्मकता से संबद्ध।
मणिपुरनाभि चक्र, आंतरिक शक्ति, इच्छाशक्ति और रूपांतरण से संबद्ध। गुरुदेव के ध्यान में यह एकाग्रता का आरंभ-बिंदु है।
अनाहतहृदय चक्र, प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक खुलेपन से संबद्ध।
विशुद्धिकंठ चक्र, शुद्धि और अभिव्यक्ति से संबद्ध।
आज्ञाभौंहों के बीच स्थित चक्र, जिसे शिवनेत्र या तीसरा नेत्र भी कहते हैं। गुरुदेव के निर्देशित ध्यान में यही मुख्य ध्यान-बिंदु है।
सहस्रारसहस्र दल कमल से प्रतीकित शीर्ष केंद्र, उच्चतम आध्यात्मिक चेतना से संबद्ध।

5. देवता और आध्यात्मिक विभूतियाँ

शब्दअर्थ
शिव / भोलेनाथ / महेश्वरपरिवर्तन, लय और परम चेतना के देवता। तंत्र परंपरा में शिव और शक्ति अविभाज्य हैं। भोलेनाथ उनका स्नेहपूर्ण नाम है।
महाकालीदिव्य माँ का प्रचंड रूप, काल, परिवर्तन और नकारात्मक शक्तियों पर विजय से संबद्ध।
त्रिपुर सुंदरीश्रीविद्या परंपरा में दिव्य माँ का प्रमुख रूप, परम सौंदर्य और चेतना की प्रतीक।
दशमहाविद्यातंत्र परंपरा में देवी के दस महान स्वरूप।
कामाख्याअसम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में पूजित दिव्य माँ का प्रमुख तांत्रिक रूप।
गणेशविघ्नहर्ता और प्रारंभ के रक्षक। गुरुदेव के ध्यान में कुंडलिनी द्वार के रक्षक।
ब्रह्मा, विष्णु, नारायणसृष्टि और पालन के देवता; नारायण को प्रायः विष्णु से अभिन्न माना जाता है।
यमराजमृत्यु के देवता और दिवंगत आत्माओं के न्यायाधीश।
आदि शंकराचार्यअद्वैत वेदांत को व्यवस्थित रूप देने वाले महान दार्शनिक और आध्यात्मिक गुरु।

6. अनुष्ठान, पर्व और सेवा

शब्दअर्थ
श्रीविद्यादिव्य माँ, विशेषकर त्रिपुर सुंदरी की उपासना की तांत्रिक परंपरा।
यज्ञ / हवनअग्नि, मंत्रोच्चार और आहुतियों के साथ किया जाने वाला पवित्र अनुष्ठान।
नवरात्रदिव्य माँ और उनके विभिन्न रूपों को समर्पित नौ दिनों का पर्व।
विजयादशमी (दशहरा)असत्य पर सत्य की विजय का पर्व, जो नवरात्र की नौ रातों के बाद दसवें दिन मनाया जाता है।
नवमी / दशमीचंद्र मास की नौवीं और दसवीं तिथि।
सेवा / गौ सेवानिःस्वार्थ सेवा; गौ सेवा में गायों का संरक्षण, पोषण और देखभाल शामिल है। गुरुदेव के उपदेश में इसका अत्यंत विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
गौ मातामातृत्व, पोषण और जीवन की पवित्रता की प्रतीक के रूप में गाय के प्रति श्रद्धा।
गौशालागायों के संरक्षण और देखभाल का स्थान।
गौ तीर्थगायों से जुड़ा पवित्र स्थान। गुरुदेव ने यह शब्द उस स्थान के लिए प्रयोग किया जहाँ उनके अमेरिकी शिष्य गौ सेवा करते हैं।
भजनईश्वर के प्रति भक्ति व्यक्त करने वाला आध्यात्मिक गीत।

7. गुरु, परंपरा और पवित्र स्थान

शब्दअर्थ
गुरु / गुरुदेवआध्यात्मिक मार्गदर्शक; गुरुदेव का अर्थ है "दिव्य गुरु"।
मूल गुरुकिसी गुरु-परंपरा के मूल आध्यात्मिक स्रोत।
बाबा जी / गुरुमाता जीदरबार से जुड़े पूज्य आध्यात्मिक गुरु और आध्यात्मिक माँ।
दरबारशाब्दिक अर्थ राजसभा; गुरुदेव के उपदेश में बाबा और माँ की पवित्र आध्यात्मिक उपस्थिति और उनका कार्यक्षेत्र।
मठ / मिश्री मठआध्यात्मिक संस्थान; मिश्री मठ का उल्लेख गुरुदेव उत्तराखंड में अपने निवास और गौ सेवा की योजना के संदर्भ में करते हैं।
ऋषि / मुनिप्रत्यक्ष आध्यात्मिक ज्ञान वाले वैदिक द्रष्टा; मौन, ध्यान और चिंतन में लीन तपस्वी।
शास्त्र / वेदपवित्र ग्रंथ; वेद हिंदू परंपरा के सबसे प्राचीन पवित्र ग्रंथ हैं।
देवभूमि / दिव्यभूमिउत्तराखंड का पारंपरिक नाम "देवभूमि" है। गुरुदेव इसे "दिव्यभूमि" कहते हैं, ताकि इसके सर्वव्यापी आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित किया जा सके, जो केवल देवताओं की उपस्थिति से भी आगे है।

8. सामूहिक ध्यान में प्रयुक्त मंत्र

मंत्रअर्थ
ॐ श्री गणेशाय नमःपूज्य गणेश को प्रणाम।
ॐ श्री ब्रह्मदेवाय नमःपूज्य ब्रह्मदेव को प्रणाम।
ॐ नमो नारायणायभगवान नारायण को प्रणाम।
ॐ श्री महेश्वराय नमःपूज्य महेश्वर, भगवान शिव को प्रणाम।
ॐ नमः शिवायशिव को प्रणाम।

इन मंत्रों का प्रयोग गुरुदेव निर्देशित ध्यान में विभिन्न दिव्य तत्त्वों के आवाहन और ऊर्जा केंद्रों पर क्रमशः ध्यान केंद्रित करने के लिए करते हैं।

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